डॉ. मोनिका शर्मा

सावन की बूंदों संग जीवनदायी जल ही नहीं स्नेह भी बरसता है। स्नेह भरा रंग, जो जीवन की ख़ुशियों का आधार है। तभी तो इस मौसम में त्योहार के रंग, अपनों का स्नेहिल साथ और अपनापन एक अलग ही उत्साह

से भर देते हैं।

वर्षा ऋतु के मनमोहक वातावरण में तो प्रकृति मानो खिलखिलाती है, नए रंग में श्रृंगार कर अपना

रूप बदल लेती है। बरसती बूंदों से धुला आकाश और हर तरफ छाई हरियाली कभी मायके की याद दिलाती है तो

कभी बचपन में सखियों संग झूले झूलने की स्मृतियां सहेज लाती है।

सुखद यह कि बदलते वक्त के साथ भी ये रंग फीके नहीं पड़े हैं। आज भी हर उम्र की स्त्रियां इन खूबसूरत रंगों को जी भरकर जीती हैं और इनमें रम जाती हैं। धानी-चूनर ओढ़े धरती बरसात का मौसम आते ही कई त्योहारों की तैयारियां शुरू हो जाती है। उत्सव पर्व मनाने की रंगत जीवन को भी नए रंग में रंग देती है।

प्रकृति का हरा रंग महिलाओं के साजो-श्रृंगार में भी खूब दिखने लगता है। तीज और राखी जैसे उत्सव भी इसी मौसम में आते हैं। इसिलए माना जाता है कि यह स्नेहिल साथ और जुड़ाव का मौसम है।

यह मौसम हमारी उम्मीदों से भी जुड़ा होता है। साल भर की खेती किसानी इसी मौसम में बरसीं फुहारों पर निर्भर होती है। जीवन की सबसे जरूरी चीजें अन्न और जल बरखा की बूंदों से ही मिलते हैं। यही वजह है कि बरसात की बूंदों की अगवानी मन और जीवन दोनों करते हैं। वैसे भी हमारी लोक-संस्कृति में "ङकृति से जुड़े ऐसे उत्सवों का अहम स्थान है। इन दिनों पूरे एक साल के बाद धरती मानो कोई धुन गुनगुनाने लगती है।

रिमझिम फुहारों के बीच संपूर्ण धरा एक छोर से दूसरे छोर तक धानी चूनर ओढ़कर इठलाने लगती है। पारंपरिक मान्यताओं का नया मिजाज तीज हो या श्रावण सोमवार के व्रत मेहंदी, पूजा, गीत और सज-धज, आज भी सब कुछ पारंपरिक रीत-रिवाज के अनुसार ही होता है।

हां, समय के साथ कुछ बदलाव जरूर आए हैं पर परंपरा के रंग फीके नहीं पड़े हैं। कामकाजी हों या गृहिणियां, महिलाएं इन उत्सवों को पूरे मान के साथ मनाती हैं। हमारे यहां तो हर क्षेत्र, हर "ङांत में अलग मान्यताएं हैं। देश के हर हिस्से में इन्हीं परंपरागत रीत-रिवाजों के अनुसार उत्सवीय रंगों को जिया जाता है। आज के दौर में परंपराओं का रूप तो नहीं पर निर्वहन का अंदाज काफी हद तक बदल गया है।

उच्च शिक्षित उत्सवीय रंगों से खिलता जीवन...


लड़कियां और ऊंचे ओहदों पर बैठी महिलाएं भी पारंपरिक पहरन और साज-श्रृंगार के साथ ऐसे उत्सवों को मनाती हैं। हमारे पारंपरिक संस्कारों में इन पर्वों त्योहारों को इसलिए स्थान दिया गया है कि वे संबंधों में सकारात्मक

ऊर्जा का संचार कर सकें।

यही वजह है कि त्योहारी संस्कृति में नवीनता के समावेश ने कुछ नए रंग और भर दिए हैैं। सच, कितना सुंदर संयोग बनाते हैं ये त्योहार जो जीवन में स्नेह और समर्पण का "ङतीक बनकर रिश्तों में और मिठास घोलते हैं। ऐसे त्योहारों पर घर से लेकर बाजार तक खूब रौनक होती है। हर कोई इनके रंगों में डूबा दिखाई देता है।

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