Delhi Air Pollution: राजधानी दिल्ली के लोगों को प्रदूषण से कुछ राहत मिली है, लेकिन इसका एक और बड़ा नुकसान सामने आया है। एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई (पीएम 10) का सुरक्षा स्तर से 10 गुना बढ़ना स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जा रहा है। सांस लेने वाली हवा की गुणवत्ता में गिरावट के कारण कई दूषित तत्व फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे प्रदूषक तत्वों का सांस के साथ अंदर पहुंचना न केवल जानलेवा समस्या पैदा करता है, बल्कि कई अन्य बीमारियों को भी जन्म देता है। इनमें सांस की बीमारियां, दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और यहां तक कि पुरुषों के शुक्राणुओं का प्रभावित होना भी शामिल है।

पीएम 10 पार्टिकल्स में खून के प्रवाह में फ्री रेडिकल्स बढ़ाने की प्रवृत्ति होती है, जो पुरुषों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट की एक वजह है। एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन युक्त पीएम 10 का शरीर में हार्मोन के बदलाव से सीधा संबंध देखा गया है। टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजेन स्तर में गिरावट से न केवल यौन संबंध की इच्छा घटने लगती है, बल्कि संतान उत्पन्न करने की क्षमता भी कम होने के संकेत मिलते हैं।

हवा में कैडमियम, मर्करी और लेड जैसे हेवी मेटल मौजूद होनेसे भी शुक्राणुओं की आयु पर असर होता है और 90 दिनों में दुष्परिणाम नजर आने लगते हैं। शुक्राणुओं का गतिशील होना और उनका कंसंट्रेशन भी महत्वपूर्ण कारक हैं जिन पर गर्भवती होना निर्भर करता है परंतु प्रदूषण से शुक्राणु के ये दोनों पहलू प्रभावित होते हैं।

शुक्राणुओं की संख्या में कमी

शुक्राणुओं में कमी और खराबी आने को इंडोक्राइन डिजास्टर एक्टिविटी (हार्मोन का असंतुलन) कहते हैं। हम जिस हवा में सांस लेते हैं उसमें मौजूद पार्टिकुलेट मैटर (इंसान के बाल से 30 गुना बारीक) में कॉपर, जिंक, लेड आदि होते हैं जो एस्ट्रोजेनिक और एंटीएंड्रोजेनिक हैं और लंबी अवधि तक सांस के साथ अंदर जाने पर टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म सेल्स बनने में बाधक हो सकते हैं। ऐसी विषैली हवा में सांस लेने से शुक्राणुओं का क्षय होता है और शुक्राणुओं की संख्या इतनी घट सकती है कि गर्भधारण करना असंभव हो जाता है।

विभिन्ना अध्ययनों से यह प्रमाणित किया गया है कि स्पर्म सेल्स का जीवन चक्र 72 दिनों का है और प्रदूषण के दुष्परिणाम 90 दिनों तक इसके प्रकोप में रहने के बाद नजर आते हैं। सल्फर डाईआक्साइड में वृद्घि से स्पर्म का कंसंट्रेशन 8प्रतिशत कम हो जाता है और गतिशीलता में 12 प्रतिशत कमी आती है। स्पर्म का आकार और गतिशीलता प्रभावित होने से पुरुष की प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है जिससे ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस और डीएनए को नुकसान पहुंचता है।

रोगग्रस्त शरीर पर गंभीर असर पहले से रोगग्रस्त मरीजों के लिए इस जहरीली हवा को सहना कठिन हो जाता है। 5 साल से कम के बच्चों पर भी संक्रमण का असर देखा जा रहा है। हवा में मौजूद विषैले तत्व उनके इम्यून सिस्टम का नाश कर देते हैं। बहुत अधिक उम्र के लोगों की सांस की समस्याएं और अधिक हैं। उनमें साइनसाइटिस, कंजेश्चन, सांस की तकलीफ और दमे की शिकायत बढ़ने की स्थिति बनने लगती है। क्या हैं बचाव के उपाय प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दी हो सके खुद को दूर कर लें। किसी ऐसे स्थान पर अस्थाई तौर पर शिफ्ट हो जाएं जहां की वायु शुद्ध हो और स्वास्थवर्धक हो। प्रदूषण का प्रकोप कम होने पर पुनः उसी स्थान पर लौट सकते हैं। अधिक से अधिक समय तक घरों अथवा ऑफिस के अंदर रहें ताकि वायुमंडल के प्रदूषण से संपर्क न हो सक

(डॉ. अमर कारिया, आईवीएफ एक्सपर्ट, भोपाल)

Posted By: Arvind Dubey