बुजुर्ग लोग टीकाकरण के बावजूद सुरक्षित नहीं हैं। इसलिए इनके साथ रहने वाले लोगों को भी वैक्सीन लगवाने की जरूरत है। कोरोना वायरस (कोविड-19) के खिलाफ एंटीबाडी को लेकर एक नया अध्ययन किया गया है। इसका दावा है कि युवाओं की तुलना में बुजुर्गों में कम मात्रा में एटीबाडी बन सकती है। शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बुजुर्गों में भले एंटीबाडी की कम प्रतिक्रिया पाई गई हो, लेकिन हर उम्र के ज्यादातर लोगों में वैक्सीन न सिर्फ संक्रमण की रोकथाम बल्कि इसे गंभीर होने से रोकने में भी कारगर साबित हुई है। शोधकर्ताओं ने 50 बुजुर्गों और युवाओं को दो समूहों में बांटकर यह अध्ययन किया। वैक्सीन की दूसरी डोज लगने के दो हफ्ते बाद इन प्रतिभागियों के रक्त नमूनों की जांच की गई। 70 से 82 वर्ष के बुजुर्गों की तुलना में 20 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों में करीब सात गुना अधिक एंटीबाडी की प्रतिक्रिया पाई गई। अमेरिका की ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी (ओएचएसयू) के शोधकर्ताओं के अनुसार, एक नए प्रयोगशाला अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता और ओएचएसयू के असिस्टेंट प्रोफेसर फिकाडू टफेस ने कहा, "टीके के बावजूद हमारे बुजुर्ग कोरोना के नए वैरिएंट के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं। एंटीबाडी एक प्रकार का ब्लड प्रोटीन है, जिसकी उत्पत्ति प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) संक्रमण से बचाव के लिए करती है। कोरोना संक्रमण के खिलाफ बचाव में भी इसकी अहमियत जाहिर हुई है।

Posted By: Navodit Saktawat

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