वैज्ञानिक पत्रिका एएमबीओ मालिक्यूलर मेडिसिन में स्टडी डाटा के अनुसार बताया गया कि डिमेंशिया के इलाज के लिए माइक्रोआरएनए का इस्तेमाल हो सकता है। जब डिमेंशिया के लक्षण की आशंका उभरती है, तब तक दिमाग को पहले ही काफी क्षति पहुंच चुकी होती है। विज्ञानियों ने खून में एक ऐसे अणु की पहचान की है जिससे विक्षिप्तता या उन्माद (डिमेंशिया) होने के खतरे का अनुमान लग जाएगा। एक साधारण से ब्लड टेस्ट की मदद से इस अणु की पहचान हो सकेगी और इससे डिमेंशिया होने के दो से पांच साल पहले ही इसका पता चल जाएगा। इससे मरीज का वक्त रहते समुचित इलाज संभव होगा।

डीजेडएनई और यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर गोटिनजेन (यूएमजी) के शोधकर्ताओं ने एक बायोमार्कर की खोज की है। इसे माइक्रोआरएनए के स्तरों पर मापा जाता है। यह माइक्रोआरएनए प्रोटीन के उत्पादन को प्रभावित करता है। इसीलिए यह प्रत्येक जीवित प्रणाली के उपापचय (मेटाबालिज्म) की प्रमुख प्रक्रिया है। एक तकनीक के तौर पर इसका उपयोग व्यावहारिक नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों का मकसद एक सरल, सस्ता ब्लड टेस्ट तैयार करना है, जो कि कोविड-19 के टेस्ट सरीखा ही होगा। और डिमेंशिया के खतरे को देखते हुए इसका इस्तेमाल नियमित मेडिकल जांच में किया जा सकेगा।

शोध में यह पता चला

शोध में आंकड़ों की जांच में पता चला कि माइक्रोआरएनए के स्तरों और मानसिक स्वास्थ्य का आपस में संबंध है। बल्ड टेस्ट में इसका स्तर जितना ही कम होगा, उसकी पहचानने की शक्ति उतनी ही दुरुस्त होगी। युवाओं और बुजुर्गों दोनों में ही इसके लक्षण अचानक उभरते हैं। उनकी पहचानने की शक्ति क्षीण होने लगती है। मनुष्यों में इस अणु के रक्त में अधिक होने पर स्मृति क्षीण होने लगती है। इसका असर अगले दो से पांच सालों में नजर आता है। इस शोध को चूहों पर किया गया है।

Posted By: Navodit Saktawat