भारत में मायोपिया महामारी के रूप में बढ़ रहा है और बच्चों में मायोपिया बहुत तेज गति से बढ़ रहा है इसी पर सबका ध्यान खींचने के लिए एंटोड फार्मास्युटिकल्स एंटोड आई हेल्थ फाउंडेशन द्वारा चलाये जाने वाले एक हफ्ते के मायोपिया जागरूकता अभियान ((#ThinkMyopiaSeeBetter)) को सपोर्ट कर रहा है। 14 से 20 नवम्बर तक यह जागरूकता अभियान चलेगा। इस अभियान में स्ट्रैबिस्मस एंड पीडियाट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (SPOSI) की भी हिस्सेदारी है। भारत में 14 से 20 नवम्बर तक राष्ट्रीय मायोपिया सप्ताह मनाया जाता है। मायोपिया के कारण हर साल छोटे-छोटे लाखों बच्चे नज़र सम्बन्धी बीमारी का का शिकार हो रहे हैं। युवावस्था से लेकर वयस्कता के दौरान मायोपिया कई गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। इन गंभीर समस्याओं में मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रेटिना डिटेचमेंट, मायोपिक मैकुलोपैथी, और मायोपिक स्ट्रैबिस्मस फिक्सस शामिल है।

हाल ही में हुई एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि भारत में स्कूल जाने वाले लगभग 13 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे मायोपिया के शिकार हैं। यह संख्या पिछले कुछ सालों में दोगुनी हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते बहुत ज्यादा उपयोग की वजह से ऐसा हो रहा है।

मायोपिया को लेकर चलाया जाने वाला यह पहला ऐसा अभियान है जिसे आंखों के डॉक्टरों और फार्मा इंडस्ट्री के लोगों ने मिलकर सहयोग किया है। पूरे भारत में इंदौर के साथ 5000 से ज़्यादा लोगों को इस अभियान में शामिल किया जायेगा। 400 से ज्यादा फील्ड विजिट डॉक्टर उस अभियान का हिस्सा होंगे वे मायोपिया के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए शहर के 5 से ज्यादा अस्पतालों में जायेंगे। इसके अलावा एंटोड छात्रों को मायोपिया के बारे में जागरुकत करने के लिए स्कूलों के साथ साझेदारी करेगा और इंदौर के विभिन्न हिस्सों में मुफ्त आँखों की जांच का कैम्प लगाएगा। मायोपिया के विभिन्न पहलुओं पर माता-पिता और बच्चों को शिक्षित करने के लिए कंपनी 800 से ज्यादा आँखों के बाल रोग विशेषज्ञों के साथ सहयोग कर रही है।

एंटोड फार्मास्युटिकल्स के सीईओ श्री निखिल मासुरकर ने मायोपिया के बढ़ते चलन और रोकथाम पर अपनी राय रखते हुए कहा, "मायोपिया भारत में बढ़ती हुई एक प्रमुख समस्या है और अगर इसको रोकने के लिए जरूरी रोकथाम और कार्रवाई नहीं की गयी तो यह एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन जाएगी। इसके अलावा कोविड-19 ने काफी हद तक इस समस्या की भयावहता को बढ़ा दिया है जिससे देश के हेल्थकेयर सिस्टम पर मायोपिया का बोझ बढ़ गया है। दुनिया भर में हुए रिसर्च से पता चला है कि कोविड लॉकडाउन के कारण बारीक चीजों को करने की गतिविधियों में वृद्धि हुई है। इस दौरान बच्चों द्वारा बाहर कम समय बिताने के कारण उनमें मायोपिया बढ़ा है। समाज में किसी भी बदलाव की शुरुआत एक आवाज से होती है। इसलिए आंखों की देखभाल करने वाले डॉक्टरों और इंडस्ट्री पार्टनर की एक सामूहिक आवाज बनकर जागरूकता बढ़ाना और मायोपिया के बारे में माता-पिता और बच्चों को क्लीनिक में लाना बहुत जरूरी बन गया है। भारत भर से 5 लाख से ज्यादा बच्चों तक पहुँचने का लक्ष्य रखने वाले इस हफ्ते भर चलने वाले अभियान में हमारी कोशिश यह रहेगी कि हम मायोपिया से लड़ने के लिए लोगों को अपनी आँखों की जांच कराने के लिए और अच्छी आदतों को अपनाने को बढ़ावा दिया जाए।"

मायोपिया जागरूकता अभियान का उद्देश्य मायोपिया के बारे में जागरूकता बढ़ाना और माता-पिता को साल में कम से कम एक बार अपने बच्चों की आंखों की जांच कराने के लिए प्रोत्साहित करना है:

- मायोपिया की शुरुआत होने के ख़तरे के बारे में लोगों को बताना

- जो पहले से ही मायोपिया से पीड़ित हैं उन्हें मायोपिया के बढ़ने के बारे में सूचित करना

- मायोपिया का प्रबंधन अच्छे तरीके से करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करना

इंडिया ऑय केयर इंदौर के डॉ बीरेंद्र झा ने कहा “माता-पिता को अपने बच्चों को स्क्रीन पर कम समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें उन्हें अधिक बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और खुद को अधिक शारीरिक खेलों और शारीरिक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए, जो महत्वपूर्ण हैं। यदि आप किसी बच्चे या छोटे बच्चे को स्क्रीन नहीं देते हैं, तो उन्हें मायोपिया होने की संभावना कम होती है। इसलिए हमें इन मुद्दों की प्री-मायोपिया अवस्था में पहचान करनी चाहिए। इसके अलावा, आंखों की नियमित जांच बेहद जरूरी है क्योंकि इससे इस बीमारी का जल्द पता लगाने और रोकथाम में मदद मिल सकती है। हम इस अभियान का हिस्सा बनकर खुश हैं जो नेत्र देखभाल पेशेवरों को माता-पिता और उनके बच्चों को मायोपिया पर चर्चा शुरू करने और अधिक जागरूकता बढ़ाने में मदद करने के लिए अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करने का आह्वान करता है”।

Posted By: Arvind Dubey

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