भारत और चीन नए जूनोटिक वायरल बीमार के सबसे बड़े हॉटस्पॉट बन सकते हैं। यह महामारी वन्यजीवों से अन्य स्तनधारियों में फैलती हैं। अगर जंगलों पर मानव दबाव बढ़ता रहा। तो अगले कुछ दशकों में मनुष्यों के इसके चपेट में आने की संभावना है। यह बात स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स फॉरेस्ट 2022 की रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट 'नेचर पत्रिका' में प्रकाशित एक शोध पत्र में इसी तरह ही भविष्यवाणी किए जाने के कुछ दिनों बाद आई है। जिसमें कहा गया, 'जलवायु परिवर्तन से अगले 50 सालों में अन्य स्तनधारियों में वायरस संचारित करने वाले मैमल्स के 15 हजार से अधिक नए केस सामने आएंगे।'

ट्रांसमिशन का जोखिम अधिक

स्टडी में कहा गया कि कम से कम 10 हजार वायरस प्रजातियों में मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता है। जलवायु परिवर्तन से क्रॉस-प्रजाति वायरस ट्रांसमिशन का जोखिम बढ़ जाता है। अध्ययन में चेतावनी दी गई कि जलवायु और भूमि उपयोग में परिवर्तन से वन्यजीवों की भौगोतिक दृष्टि से अगल प्रजातियों के बीच वायरल फैलने के नए अवसर पैदा होंगे। जिसके परिणामस्वरूप जूनोटिक स्पिलओवर, जानवरों से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियां होंगी।

एशिया और अफ्रीका में खतरा

अध्ययन में कहा, 'यह जोखिम एशिया और अफ्रीका में सबसे अधिक होगा। जहां उच्च मानव जनसंख्या घनत्व क्षेत्र है। इस तरह के वायरस ट्रांसमिशन में 4,000 गुना वृद्धि देखी जा सकती है।' जब से कोरोना वायरस महामारी ने जूनोटिक रोगों के प्रसार पर नए सिरे से चिंता व्यक्त की है। इसका जिक्र विश्व के वनों की स्थिति रिपोर्ट में किया गया है। कहा कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और साझा पर्यावरण से निकटता से जुड़ा हुआ है।

खतरे को कंट्रोल करने उठाना होगा कदम

रिपोर्ट में कहा गया कि भूमि-उपयोग योजना के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र-स्वास्थ्य आयाम को संबोधित करना। वन और वन्यजीव क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधकों की अधिक भागीदारी महत्वपूर्ण है। अध्ययन में आगे कहा गया, 'खतरे को नियंत्रित करने की निगरानी और डेटा-साझाकरण करना जरूरी है।'

Posted By: Shailendra Kumar

  • Font Size
  • Close