सीमा एम.

जहां तक काम की बात है तो सुमेधा महाजन एक बिजनेस कसंल्टंट हैं लेकिन जब उनके शौक की बात आती है तो वे एक रनर हैं। आप कह सकते हैं कि रनर तो कई होते हैं फिर सुमेधा में खास बात क्या है? तो सुमेधा 2012 में दिल्ली से मुंबई तक की दौड़ लगाने वाली टीम में अकेली महिला थी। 30 दिनों में करीब 1500 किमी की इस दौड़ ने उन्हें कई तरह के अनुभवों से रूबरू करवाया और वे दूसरों के लिए एक उदाहरण भी बनी।

इस दौड़ के अपने अनुभवों को उन्होंने हाल ही में 'माइल्स टू रन बिफोर आई स्लीप" शीर्षक से आई पुस्तक में भी दर्ज किया है। सुमेधा कहती हैं, 'मैंने जिंदगी से सीखा है कि यहां कोई भी आपकी मदद के लिए आगे नहीं आएगा। हर समय आपको ही आगे बढ़ने की हिम्मत जुटाना होगी।"

सुमेधा का रनर होना इसलिए भी प्रेरणा बन जाता है क्योंकि जब उनका जन्म हुआ तो वे अस्थमा से पीड़ित थीं और अस्वस्थता और लड़की होने के कारण उन्हें कई तरह के भेदभाव झेलना पड़ते थे। वे अपने बचपन की अमृतसर की यादों के बारे में लिखती हैं कि सब मेरा मजाक उड़ाते थे और मैं चाहती थी कि इस स्थिति को बदल दूं। फिर उन्होंने रनिंग के जरिए खुद को मजबूत बनाने की ठानी और इसे मिशन बनाकर जुट गई। उनके साथ खास बातचीत।

दिल्ली से मुंबई की करीब 1500 किमी लंबी दौड़ का अनुभव कैसा रहा? इसका जिक्र आपने अपनी किताब में भी किया है। भारतीय हाइवे दुनिया की सबसे घटनाप्रधान जगह है। आप नहीं जान सकते कि अगले ही पल आपके साथ क्या हो सकता है। भले ही सड़कें अच्छी हों लेकिन रास्ते में कुछ भी आ सकता है। बोतलों के कांच, एक्सीडेंट में मारे गए जानवर और वाहनों का कबाड़ और बहुत सी व्यथित करने वाली चीजें। फिर यह भी कि इस पूरे 1500 किमी के हाइवे पर कहीं भी टॉयलेट नहीं था। इसके अलावा पूरे रास्ते पर ही लोग आपको घूरते रहते हैं।

अगर आप सड़क के किनारे किसी ढाबे पर खुद को आराम देने के लिए रुकते हैं तो ये भी बहुत ही गंदी जगह होती है कि आप कुछ भी खा नहीं सकते। मुझे पूरे वक्त इन्फेक्शन का डर लगा रहता था। फिर अपने ही देश में हम कितने असुरक्षित महसूस करते हैं यह इस यात्रा के दौरान मैंने जाना। शायद हमारे देश के राजनीतिज्ञ और आम नागरिक विकास का सही अर्थ समझें!

लेकिन इस दौड़ का कुछ तो हासिल रहा ही होगा?

हां, कुछ अच्छे अनुभव भी हैं। जैसे मैं राजस्थान की महिलाओं से भी इसी दौरान मिली। ग्रामीण महिलाएं बहुत ही साहसी और सुंदर हैं। जब उन्होंने पहली दफा मुझे देखा तो वे आपस में खुसुर-फुसुर करने लगीं और मुझे ऐसे देखने लगीं जैसे मैं किसी दूसरे ग्रह की प्राणी हूं। लेकिन जब मैंने उनके साथ बातचीत की तो उनका बहुत प्यार मिला। उन्होंने मेरे साथ अपनी कहानियां भी बांटीं। इन सभी कहानियों का मैंने अपनी किताब में उल्लेख किया है।

लेकिन इस तरह के साहसिक कदम पर परिवार का समर्थन मिल ही जाए यह जरूरी नहीं है?

जब आप धारा के विरुद्ध तैरने का साहस करते हैं तो आपको हर बात के लिए तैयार रहना चाहिए। विरोध होंगे लेकिन आपको हौसला नहीं हारना चाहिए। अगर आप ठान लेते हैं तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।

30 दिनों की दौड़ के बाद आपने कैसा महसूस किया था? क्या बदलाव पाया अपने में?

मैंने सोचा था कि यह उपलब्धि हासिल करने के बाद मुझे बधाइयां मिलेंगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने सीखा कि दुनिया कभी भी आपके अच्छे काम की प्रशंसा नहीं करेगी। आपको खुद ही अपनी पीठ थपथपाना होगी। अपना भरोसा बनाए रखते हुए जिंदगी में आगे बढ़ें।

इस तरह हुई रनिंग की शुरुआत

सुमेधा बताती हैं कि उन्होंने 2010 में रनिंग की शुरुआत की। शुरुआत में वे अमृतसर और चंडीगढ़ में ही रनिंग के लिए जाती थीं। इसके बाद जब वे दिल्ली आईं तो नियमित रूप से रनिंग करने लगीं। तब वे खुद को फिट रखने के लिए रनिंग करती थीं और धीरे-धीरे उन्हें मैराथन के बारे में पता चला और उन्होंने उसमें भाग लेने की इच्छा की। फिर जब वे मुंबई आईं तो उन्हें लगा कि यह तो बिलकुल ही अलग जगह है। यहां दिल्ली की तरह पार्क नहीं थे और केवल जिमखाना में ही रनिंग की जा सकती थी। लेकिन उन्होंने रनिंग छोड़ी नहीं।

पहली बार स्पर्धा में

वे बताती हैं कि 2010 में जब हम मुंबई आए तो यहां खार इलाके में मैंने रनिंग के लिए जगह ढूंढी। यहां मैंने देखा कि बच्चे, बूढ़े और जवान समर्पण के साथ रनिंग करते हैं। वे दिन या रात जब भी समय मिले दौड़ने के लिए आते हैं और हर वक्त यहां कोई न कोई फिटनेस के लिए रनिंग करता ही मिलता था। यहीं से मुझे प्रेरणा मिली कि मुझे भी नियमित रनिंग करना है। मुंबई के बारे में मैंने शुरुआत में जो सोचा था अब वह सोच भी बदल गई थी। मैंने पहली बार किसी बड़ी मैराथन स्टैंडर्ड चार्टर्ड मैराथन में भाग लिया। मैं हॉफ मैराथन में ही हिस्सा लेना चाहती थी लेकिन रजिस्ट्रेशन फुल हो जाने से मुझे फुल मैराथन में भाग लेना पड़ा।

इस दौड़ के लिए मेरी तैयारी नहीं थी। तब मुझे पता भी नहीं था कि मैराथन के लिए क्या ले जाना है लेकिन आसपास के लोगों ने मेरा हौसला बढ़ाया। इस दौड़ में मैं 15 वीं पायदान पर रही थी जो मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। यहीं मेरा खुद पर भरोसा बढ़ा कि मैं दौड़ सकती हूं।

दुर्घटना के बाद भी जारी रही रनिंग

अब मैं नियमित रूप से रनिंग करने लगी। इसी समय मुझे पता चला कि बेंगलुरु में अल्ट्रा मैराथन होने वाली है। लोग एक ही दिन में 100 किमी तक की रनिंग करेंगे इस बात ने मुझे चकित किया। मैंने 75 किमी वाली दौड़ में हिस्सा लिया और पहले नंबर पर रही। इसके बाद मैंने 2012 में फिर से स्टैंडर्ड चार्टर्ड मैराथन में हिस्सा लेना का सोचा लेकिन एक दिन कार से टक्कर लगने के कारण यह सपना टूट गया।

मुझे लंबर स्पॉन्डोलाइसिस हुआ। मैं फिजियोथेरेपी और आराम से ठीक हुई। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच भी रनिंग के लिए मेरा प्यार कम नहीं हुआ और आज लगता है कि यही मेरी जिंदगी है। मैं हर दिन 10 से 20 किमी के बीच दौड़ती हूं ताकि अच्छा महसूस करूं।