विमल कुमार

इसे इत्तेफाक कह सकते हैं कि मंगलवार दोपहर मुंबई में जब संदीप पाटिल और उनके चार साथियों ने मिलकर वर्ल्ड कप 2015 के लिए जो 15 खिलाड़ी चुने, वो काम राहुल द्रविड़ करीब 24 घंटे पहले ही बिना चयनकर्ता हुए कर चुके थे। पूर्व भारतीय कप्तान ने एक स्पोर्ट्स चैनल के लिए जो टीम चुनी थी वह हूबहू वही थी जो पाटिल एंड कंपनी ने चुनी। ऐसा नहीं है कि यह जबरदस्त काम था या फिर महज तुक्का।

दरअसल, हकीकत यह है कि इस बार चयनकर्ताओं के लिए वर्ल्ड कप टीम का चयन करना शायद सबसे आसान काम रहा। और इसकी वजह रही पिछले 2 सालों से चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट की एक दिशा वाली सोच। अगर आप भी भारतीय क्रिकेट को करीब से देख रहे हैं तो 15 में से 14 खिलाड़ी वही होते जो चयनकर्ताओं ने चुने।

हां, 15वें खिलाड़ी को लेकर स्टुअर्ट बिन्नी, युवराज सिंह, कर्ण शर्मा, मुरली विजय, मोहित शर्मा, धवल कुलकर्णी जैसे नामों पर बहस हो सकती थी। और इस पर हुई भी। पूर्व चयनकर्ता और 1992 में ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में हुए वर्ल्ड कप में खेल चुके किरण मोरे का कहना है- 'बिन्नी का फैसला थोड़ा-सा नजदीकी वाला रहा। मैं यह नहीं कहूंगा कि वे इस टीम में आने के हकदार नहीं थे लेकिन शायद मैं तेज गेंदबाज मोहित शर्मा को चुनता।"

'युवी में पहले वाली बात नहीं"

युवराज सिंह को लेकर बहुत बातें हो रही हैं। लेकिन युवराज सिंह पहले संभावित 30 खिलाड़ियों में भी नहीं थे और पिछले डेढ़ साल से वन-डे टीम में भी नहीं रहे। ऐसे में सिर्फ रणजी ट्रॉफी के तीन मैचों में तीन शतक के बूते उन्हें चयनकर्ता वर्ल्ड कप टीम में लेने का जोखिम नहीं ले सकते थे। 2011 में मुख्य चयनकर्ता के तौर पर वर्ल्ड कप टीम चुनने वाले के. श्रीकांत का भी कहना है, 'लोग जरूरत से ज्यादा भावुक हो जाते हैं। 4 साल एक लंबा वक्त होता है। दरिया में काफी पानी बह चुका है। युवी पहले वाले युवराज नहीं हैं। और यह जरूरी तो नहीं कि पिछली बार का चैंपियन खिलाड़ी सिर्फ पुरानी साख के दम पर इस बार भी टीम में शामिल हो।

1983 में जब हमारी टीम चैंपियन बनी थी तो इसके 4 साल बाद वाली टीम में न तो मोहिंदर अमरनाथ थे और न ही मदनलाल।" बल्लेबाजी में यह टीम अनुभव और साख के लिहाज से 2011 की टीम से कागज पर कमजोर दिखती है। इस टीम की औसत उम्र 27 साल है। इनके बल्लेबाजों के पास करीब 30 हजार रनों का अनुभव और इनका औसत करीब 40 का और स्ट्राइक रेट 88 का है।

48 शतक और 178 अर्धशतक का अनुभव इस युवा टीम के पास है। लेकिन, अगर आप 2011 की टीम से इसकी तुलना करें तो उस टीम के पास 2000 मैचों का अनुभव, 50 हजार से ऊपर रन, 99 शतक और 273 अर्धशतक का अनुभव था। उस टीम में सचिन तेंदुलकर, सहवाग, गंभीर, जहीर खान, आशीष नेहरा, युवराज, हरभजन जैसे खिलाड़ी थे जिनमें गंभीर को छोड़ बाकी 5 ने 2003 वर्ल्ड कप फाइनल भी खेला था।

फुर्ती में अव्वल, अनुभव में कमतर

लेकिन, सच यह भी है कि उस टीम की फील्डिंग बेहद साधारण थी। शायद ही इस बात पर बहस हो कि 2011 में वर्ल्ड चैंपियन बनने वाली टीम पुरानी चैंपियन टीमों से फील्डिंग की तुलना में सबसे कमजोर थी। लेकिन, मौजूदा टीम इस मामले पर भारतीय इतिहास की सबसे ताकतवर फील्डिंग यूनिट में से एक है। कप्तान धोनी को अक्सर अच्छी फील्डिंग करने वाले खिलाड़ी ज्यादा भाते हैं। धोनी ने 2011 वर्ल्ड कप के दौरान कई बार इस बात को दोहराया था कि उनकी टीम में कई सीनियर खिलाड़ियों के चलते फील्डिंग पर असर पड़ा।

बहरहाल, इस टीम में धवन, रहाणे, रोहित शर्मा, कोहली, रैना, और अंबाती रायडू समेत ऑलराउंडर फील्डर हैं जिसका मतलब यह है कि वे इनर सर्कल में तेज तर्रार हैं और बाउंड्री पर रन रोकने में भी माहिर। 'सबसे अच्छी बात यह है कि ईशांत शर्मा को छोड़ दिया जाए तो बाकी तेज गेंदबाज भी इस टीम के लिए आउटफील्ड में अच्छे फील्डर हैं और इनकी थ्रोइंग भी बढ़िया है। ऑस्ट्रेलिया के बड़े मैदानों पर यह एक अहम फैक्टर होगा।" यह कहना है किरण मोरे का।

स्पिन को कम आंकने की भूल

स्पिन गेंदबाजी के मोर्चे पर टीम इंडिया ने ऑफ स्पिनर आर अश्विन के अलावा दो लेफ्ट ऑर्म स्पिनर रवींद्र

जड़ेजा और अक्षर पटेल को चुना है। लेकिन, लेग स्पिनर कर्ण शर्मा को मौका नहीं दिया। जबकि ऑस्ट्रेलिया की पिचों पर लेग स्पिनर के कामयाब होने के कई उदाहरण हैं। 1992 में जब पाकिस्तान की टीम ऑस्ट्रेलिया में चैंपियन बनी थी तो उनके लेग स्पिनर मुश्ताक अहमद की भूमिका को कौन भूल सकता है?

टीम इंडिया के पूर्व खिलाड़ी संजय मांजरेकर ने भी कर्ण शर्मा के तौर पर लेग स्पिनर न होने से भारतीय आक्रमण में विविधता की कमी के मुद्दे को उठाया लेकिन पूर्व चयनकर्ता मोरे मौजूदा टीम मैनेजमेंट और चयनकर्ताओं की सोच का समर्थन करते हैं। कर्ण को एडिलेड टेस्ट में मौका दिया गया था लेकिन यह साफ दिखा कि अभी उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लंबा फासला तय करना है। वैसे भी कर्ण अनिल कुंबले की तरह लंबाई वाले लेग स्पिनर नहीं हैं जो वहां की बाउंस का फायदा उठाकर विरोधी को परेशान कर सकते हैं।

2011 चैंपियन टीम के सिर्फ 4 खिलाड़ी इस बार वर्ल्ड कप में शिरकत करेंगे। 11 खिलाड़ियों के लिए पहली बार इतने बड़े टूर्नामेंट में खेलने का अनुभव उन्हें कहीं दबाव में तो नहीं डालेगा? श्रीकांत कहते हैं, '1983 में तो हमारी टीम के पास कोई अनुभव नहीं था। हम चैंपियन बने थे न! रोहित और ईशांत लंबे समय से वन-डे क्रिकेट खेल रहे हैं और इनके पास दबाव से पार पाने का अनुभव है।"

गेंदबाज टीम की कमजोर कड़ी

लेकिन, पिछली बार की तरह गेंदबाजी इस टीम की कमजोर कड़ी हो सकती है। ईशांत शर्मा को लंबे समय तक वन-डे के लिए योग्य नहीं माना जाता रहा। आलम यह है कि पिछली बार वर्ल्ड कप जीतने के बाद कोच गैरी कर्स्टन ने कहा था कि उन्हें टेस्ट मैचों के लिए सही तरीके से संभालकर खिलाने की जरूरत है। मोहम्मद शमी के खेल में स्थिरता की कमी साफ दिखती है।

आखिरी ओवर्स में रिवर्स स्विंग और यॉर्कर्स डालना उनकी खूबी है लेकिन वे भी वन-डे क्रिकेट में अक्सर काफी मंहगे ही साबित हुए हैं। उमेश यादव ने लंबे समय बाद वन-डे टीम में दोबारा वापसी की है। श्रीलंका के खिलाफ घरेलू वन-डे सीरीज में उनका खेल अच्छा था और काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्ल्ड कप से ठीक पहले त्रिकोणीय वन-डे सीरीज में इस तिकड़ी का खेल कैसा रहता है। तेज गेंदबाजों में सिर्फ भुवनेशवर कुमार इकलौते ऐसे खिलाड़ी हैं जिनका प्लेइंग इलेवन में हर मैच में खेलना तय है।

लेकिन, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले तीन टेस्ट मैचों में अनफिट होने से उनकी लय पर असर पड़ा है। क्लाइव लॉयड (1975 और 1979) और रिकी पोटिंग (2003 और 2007) वन-डे क्रिकेट के इतिहास में सिर्फ दो ऐसे कप्तान रहे हैं जिन्होंने वर्ल्ड कप ट्रॉफी डिफेंड की है। दिलचस्प यह है कि इन दोनों कप्तानों के पास वन-डे इतिहास का बेहद असाधारण गेंदबाजी आक्रमण था।

ऐसे में क्या ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड जैसे मुल्कों में धोनी पहले भारतीय कप्तान बन पाएंगे जिन्होंने वन-डे वर्ल्ड कप ट्रॉफी 2 बार जीती हो? 'देखिए, धोनी की कप्तानी में दम है। उनके युवा जोश में दम है। भविष्यवाणी करना मुश्किल तो है लेकिन चयनकर्ताओं ने उन्हें एक ऐसी टीम दी है जो दोबारा वर्ल्ड कप जीत सकती है।" यह कहते हैं 1983 टीम के सदस्य सैयद किरमानी।

अहम मौकों का खेल दिलाएगा कप

हकीकत यही है कि अब नये फॉर्मेट में वर्ल्ड कप जीतने के लिए जरूरी है कि टीम ग्रुप दौर में चाहे कितना भी संघर्ष क्यों ना करे, क्वार्टरफाइनल, सेमी फाइनल और फाइनल जैसे 3 निर्णायक मुकाबलों में बेहतरीन खेल दिखाए तो ट्रॉफी जीतना मुश्किल नहीं। भारत अगर अपने ग्रुप में ऑयरलैंड और जिम्बॉब्वे और यूएई जैसी कमजोर टीमों से मात नहीं खाता है तो उनके लिए अंतिम 8 में पहुंचना कोई बड़ी बात नहीं है।

इस बार भी फॉर्मेट 2011 जैसा ही है। अगर टीम इंडिया ने शुरूआती दौर में हौसला और फिटनेस बरकरार रखी तो चुनौती 2011 की तरह 2015 में नॉकआउट मैचों की होगी। उस वक्त युवराज ने अपने दम पर काफी हद तक जिम्मेदारी उठाई और उन्हें साथ मिला रैना, तेंडुलकर, गंभीर, धोनी और जहीर का... इस बार अगर कोहली वैसी ही भूमिका निभाते हैं और उनका साथ रोहित, रहाणे, धवन, भुवनेश्वर और कप्तान धोनी देते हैं तो खिताबी जीत फिर से मुमकिन हो सकती है।

टीम चयन पर उठते सवालों के जवाब

युवराज टीम में क्यों नहीं?

बेशक युवराज बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया के मैदानों पर ज्यादा दमखम की जरूरत होगी और तब युवराज की फिटनेस पर शक होता है। फिर चयनकर्ता आगे देखना चाहते हैं पीछे नहीं।

स्टुअर्ट बिन्नी का चयन क्यों?

महज छह वनडे खेलने वाले बिन्नी का चयन मध्यम तेज गेंदबाजी और बैटिंग कर पाने के कारण। टीम को स्पिन ऑलराउंडर की जरूरत नहीं थी क्योंकि जड़ेजा और अश्विन हैं। फिर बिन्नी के अलावा भारत में दूसरा तेज गेंदबाज ऑलराउंडर है कहां?

चोटिल जड़ेजा टीम में क्यों?

जड़ेजा फिल्डिंग में चुस्त हैं, बैटिंग कर सकते हैं और बॉलिंग में भी रन रोकते हैं। भले ही वे चोटिल हैं लेकिन उनके ठीक हो जाने की बात बोर्ड ने कही है। हालांकि बीच वर्ल्ड कप में उनके चोटिल हो जाने पर टीम को नया खिलाड़ी नहीं मिलेगा।

थके हुए गेंदबाजों का चुनाव?

इस युवा टीम में नए और युवा गेंदबाजों को मौका देने के बजाय परंपरागत अटैक ईशांत शर्मा, शमी और उमेश यादव पर भरोसा क्योंकि ये वन-डे के अनुरूप ढल चुके हैं। इनके अनुभव को तरजीह।

मुरली को बाहर रखना ठीक?

मुरली विजय ने ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरिज में अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन वन-डे क्रिकेट से वे दूर हैं और कोई ऐसा चमकदार प्रदर्शन नहीं जिसके बल पर उन्हें चुना जाता।

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