मुकुल व्यास

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने इस वर्ष के दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के दीर्घावधि पूर्वानुमान को पहले घोषित 93 प्रतिशत से घटाकर 88 प्रतिशत करके कृषि और उद्योग जगत में घबराहट पैदा कर दी है। पहले अप्रैल में 'सामान्य से कम' वर्षा का अनुमान लगाया गया था, जिसे मौसम विज्ञान विभाग ने पिछले दिनों 'कम वर्षा' में बदल दिया है।

संशोधित अनुमान वाकई चिंता उत्पन्न करने वाला है क्योंकि यदि यह सही हुआ तो देश के सामने सूखे की स्थिति पैदा हो जाएगी। यह 1950 के बाद देश का 12वां सबसे भयंकर सूखा हो सकता है।

पिछले वर्ष भी दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में 12 प्रतिशत की कमी रह गई थी। यदि मौसम विज्ञान विभाग का पूर्वानुमान सटीक निकला, तो देश को लगातार दूसरे साल कम वर्षा से गुजारा करना पड़ेगा। शुरूआती रुझान बहुत आशाजनक नहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं क्योंकि इस बार मानसून से पहले होने वाली (प्री-मानसून) बारिश में काफी कमी देखी गई है और वास्तविक मानसून ने चार दिन के विलंब के बाद केरल के तट को छुआ है।

यह किसानों के लिए कतई अच्छी खबर नहीं है, जो पहले ही मार्च में हुई बेमौसम बारिश से फसलों का भारी नुकसान उठा चुके हैं। पिछले साल मानसून की बेरुखी के लिए हमने एल नीनो को दोषी ठहराया था। इस साल अप्रैल में जारी पूर्वानुमान में मौसम विज्ञान विभाग ने दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के दौरान एल नीनो की परिस्थितियां बने रहने की आशंका जाहिर की है।

एल नीनो पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव से मौसम के विषम रूप देखने में आते हैं। कहीं भयानक सूखा पड़ता है और कहीं भयानक बाढ़ आती है। एल नीनो की शुरूआत ऊष्ण प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से से होती है, जहां गर्म पानी का एक विशाल तालाब-सा बन जाता है। इस गर्म पानी से उत्पन्न 'चेन-रिएक्शन' पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करने लगता है। कुछ जगह ये प्रभाव विनाशकारी सिद्ध होते हैं और आश्चर्यजनक रूप से कुछ जगह एल नीनो के प्रभाव लाभकारी भी सिद्ध होते हैं।

एल नीनो और आईओडी यानी करेला और नीम चढ़ा

कुछ मौसम विशेषज्ञों ने भारतीय मानसून में एल नीनो के अलावा आईओडी (इंडियन ओशन डाइपोल ) की भूमिका को भी रेखांकित किया है। सामान्य आईओडी में पूर्वी भूमध्य हिंद महासागर में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा ठंडा और पश्चिमी ऊष्ण हिंद महासागर में सामान्य से ज्यादा गर्म होता है। नकारात्मक आईओडी में ठीक इसके उलट होता है। यदि मजबूत एल नीनो में नकारात्मक आईओडी शामिल हो जाए, तो खराब मानसून का खतरा बढ़ जाता है।

एल नीनो का पहला असर भारत के मानसून पर ही दिखने की आशंका रहती है। यह भारत में कृषि और जल आपूर्ति के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। सच तो यह है कि भारत की एक अरब से ज्यादा आबादी मानसून पर निर्भर है। दो-तिहाई भारतीय खेतों में सिंचाई सुविधा नहीं है। ये खेत सिर्फ मानसून की वर्षा पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि यदि मानसून की वर्षा में कमी का सरकारी अनुमान सही साबित हुआ, तो इसका असर व्यापक होगा। कृषि उत्पादन में कमी का प्रभाव सिर्फ इस एक सेक्टर तक सीमित न रहकर हमारी समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगाई के रूप में यह हर वर्ग को प्रभावित करता है। याने सुदूर प्रशांत महासागर से शुरू हुआ 'चेन रिएक्शन' आपकी-हमारी जेब तक आ पहुंचता है।

अपने-अपने पूर्वानुमान

मानसून एक जटिल प्रक्रिया है और कई चीजें इसे प्रभावित करती हैं। अत: इसकी सटीक भविष्यवाणी करना मुश्किल होता है। इसमें त्रुटि की गुंजाइश हमेशा रहती है, हालांकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग पहले की तुलना में अब ज्यादा बेहतर टेक्नोलॉजी से लैस है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के एक प्रमुख अधिकारी के अनुसार मानसून के विकास की प्रक्रिया में बहुत-सी चीजें ऐसी सम्मिलित होती हैं जिनका अनुमान लगाना कठिन है।

इसी वजह से दीर्घावाधि के लिए पूर्वानुमान में त्रुटि की संभावना अधिक होती है। विभाग मानसून पूर्वानुमान के लिए एक सुपर कम्प्यूटर आधारित मॉडल का भी परीक्षण कर रहा है और उसने इस साल 86 प्रतिशत वर्षा का अनुमान लगाया है, जो संशोधित अनुमान से और भी कम है! मगर हमें भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की भविष्यवाणी से विचलित या भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।

विभाग द्वारा जारी किए गए पिछले आठ पूर्वानुमानों के विश्लेषण से पता चलता है कि वह सिर्फ तीन बार ही सटीक भविष्यवाणी कर पाया था। मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली एक निजी कंपनी 'स्काइमेट वेदर सर्विसेज" पिछले कुछ वर्षों से मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमानों को चुनौती दे रही है। 2012 में अस्तित्व में आने के बाद उसका हर पूर्वानुमान सही बैठा है ...और इस वर्ष उसने सामान्य वर्षा की भविष्यवाणी की है...।

बदलता पैटर्न वर्षा का

विश्व के तमाम देशों द्वारा स्थापित इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने बार-बार कहा है कि आने वाले समय में वर्षा का पैटर्न बदल जाएगा। लंबे समय तक ध्ाीमी बारिश के स्थान पर कम समय तक तेज बारिश होगी और इसके बाद कई सप्ताह तक सूखा पड़ेगा। ऐसी बारिश का पानी शीघ्र ही नदियों के रास्ते समुद्र में चला जाएगा और रिसकर भूजल के भंडारों (एक्वीफर) में नहीं पहुंचेगा।

इनमें जमा पानी ही ट्यूबवेल से निकाला जाता है। एक्वीफर में पानी का पुनर्भरण कम होने से इनका जलस्तर तेजी से गिरेगा। साठ के दशक के बाद हमने खाद्यान्ना उत्पादन की वृद्धि मुख्यतया ट्यूबवेल द्वारा सिंचाई को बढ़ाकर हासिल की है। यह गिनती अब उल्टी चलेगी। भूमिगत पानी घटेगा, सिंचाई कम होगी, कृषि उत्पादन कम होगा और खाद्यान्ना संकट गहराएगा।

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