मुंबई। बांबे हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) से पूछा है कि क्या उसने मालेगांव विस्फोट मामले में दायर चार्जशीट में दस्तावेजों और गवाहों के बयानों को छोटा करने की अनुमति ली थी? जस्टिस एएस ओका और जस्टिस अजय गडकरी की पीठ ने 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सवाल किया।

पुरोहित ने अदालत से दस्तावेजों और गवाहों के बयानों की बिना काटछांट की हुई प्रतिलिपि दिलाने की मांग की है। पुरोहित ने इससे पहले हाई कोर्ट में आवेदन दाखिल कर इस मामले में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधान लगाने के औचित्य को भी चुनौती दी थी। पुरोहित के वकील श्रीकांत शिवाडे ने मंगलवार को कोर्ट में कहा कि इस मामले में जब पहली जांच एजेंसी एंटी टेरोरिस्ट स्क्वायड (एटीएस) ने चार्जशीट दायर की थी, तब कई दस्तावेजों और गवाहों के बयानों को छोटा कर दिया था या छिपा दिया था।

शिवाडे ने दावा किया कि ऐसा करने से पहले एटीएस ने अदालत से अनुमति नहीं ली थी और अपने विवेक से यह फैसला किया था। इस पर पीठ ने अब मामले की जांच कर रही एनआइए से पूछा कि क्या उसने इसके लिए अदालत की अनुमति ली थी। जस्टिस ओका ने पूछा, 'क्या अदालत ने दस्तावेजों और गवाहों के बयानों को छोटा करने के लिए कोई आदेश पारित किया है? या अभियोजक ने इस संबंध में अदालत में कोई आवेदन दाखिल किया है? जांच अधिकारी को इस तरह से दस्तावेजों में काटछांट करने का अधिकार नहीं है।'

पीठ ने 26 फरवरी को मामले की अगली सुनवाई तय करते हुए एनआइए के वकील संदेश पाटिल से संबंधित जांच अधिकारी से इस बारे में जानकारी लेने को कहा। महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर, 2008 को एक मस्जिद के पास हुए धमाके में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।

पिछले साल अक्टूबर में एक विशेष अदालत ने इस मामले में पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कुछ अन्य आरोपितों के खिलाफ यूएपीए के तहत आरोप तय किए थे।

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