मुंबई। निजी कारणों से यदि कोई महिला शादी के सात साल पूरे होने से पहले आत्महत्या करती है तो उसे दहेज प्रताड़ना का मामला नहीं माना जा सकता। बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह फैसला 21 साल पुराने 'दहेज प्रताड़ना', 'अवैध संबंध' और 'क्रूरता' से जुड़े एक केस की सुनवाई के दौरान सुनाया है।

जस्टिस इंद्रजीत महंती और प्रकाश नाइक सहित एचसी की डिवीजन बेंच ने कहा कि, अभियोजन पक्ष को यह बात साबित करनी होगी कि महिला के साथ क्रूरता की गई थी। विधायी जनादेश (कानून का) है कि जब कोई महिला शादी के सात साल के भीतर आत्महत्या कर लेती है और यह दिखाया जाता है कि उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार ने 'भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए' के तहत उसके साथ क्रूरता की है तो अपराध को साबित करना होगा। जरूरी नहीं है कि, शादी के सात के भीतर की गई हर महिला की आत्महत्या को दहेज प्रताड़ना से जोड़ा जाए।

पीठ ने कहा कि, महिला के साथ हुई क्रूरता साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को जरूरी सबूत पेश करने होंगे। 21 साल पुराने इस मामले में कोर्ट ने ऐसे सबूत मांगे थे जिससे यह साबित होता हो कि, महिला के साथ हुई मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की वजह से उसने आत्महत्या कर ली और इसके लिए पति और उसका परिवार जिम्मेदार है। फिलहाल लड़की पक्ष के वकील यह साबित करने में असफल रहे। इस वजह से पति के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने या दहेज से जुड़ा अपराध साबित नहीं होता।

मामला 1996 का है। महिला के अंतिम संस्कार के एक दिन पिता ने पति के खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज कराया था। इसमें कहा गया था कि, उसकी बेटी की गर्दन पर चोट के निशान मिले थे। पिता ने कहा था कि, उनकी बेटी ने इसलिए आत्महत्या कर ली है क्योंकि उसे पता चल गया था कि उसके पति का अपनी भाभी के साथ अवैध संबंध थे। मामले की सुनवाई और सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने 1997 में उस व्यक्ति को बरी कर दिया था। इसके बाद मृतक लड़की के परिवार ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपील की। इस संबंध में उच्च न्यायालय ने कहा कि, अभियोजन पक्ष 'अवैध संबंध' या लड़की के साथ हुई 'क्रूरता' के आरोप को स्थापित करने में असफल रहा है। सबूतों के अभाव में कोर्ट ने संबंधित शख्स को बरी कर दिया।

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