102 years of Jallianwala Bagh massacre: जलियांवाला बाग हत्याकांड को 102 साल पूरे हो चुके हैं। इस दिन बैसाखी के पर्व पर अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने निहत्थे लोगों पर गोली चलवा दी थी। भारत के इतिहास में इस घटना को एक काले दिन के रूप में याद किया जाता है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी 6 खास बातें।

एक दिन पहले ही हो गई थी मार्शल लॉ की घोषणा

13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आजादी मांगने वाले आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में जमा हो रहे थे। यह खबर मिलते ही पंजाब प्रशासन ने 11 अप्रैल को ही वहां कर्फ्यू लगा दिया था। ब्रिगेडियर जनरल डायर के कमान में सेना की एक टुकड़ी 11 अप्रैल की रात को अमृतसर पहुंची और अगले दिन शहर में फ्लैगमार्च भी निकाला। एक दिन पहले ही यहां मार्शल लॉ की घोषणा भी हो चुकी थी।

सभा शुरू होने तक 10 से 15 हजार लोग जमा हुए थे

आंदोलनकारियों ने जलियांवाला बाग में एक सभा रखी थी, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। सैकड़ों लोग बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने आए थे और सभा की खबर सुनकर वहां पहुंचे थे। सभा के शुरू होने तक वहां 10-15 हजार लोग जमा हो गए थे।

कुल 1650 राउंड गोलियां चली थी

लोगों के जमा होने के बाद बाग के एकमात्र रास्ते से जनरल डायर ने अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पोजिशन ले ली और बिना किसी चेतावनी गोलीबारी शुरू कर दी। भीड़ पर कुल 1,650 राउंड गोलियां चलीं जिसमें सैकड़ों अहिंसक सत्याग्रही शहीद हो गए और हजारों घायल हुए थे। इस दौरान कई लोग बाग में बने कुएं में कूद गए थे। मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे।

एक हजार से ज्यादा लोग मारे गे थे

अनधिकृत आंकड़े के मुताबिक यहां 1,000 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे और 1,500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। जलियांवाला बाग में बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों की लाशों का ढेर लग गया था।

जनलर डायर ने खुद पर हमले की झूठी कहानी बनाई

हत्याकांड के बाद डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताया कि उस पर भारतीयों की एक फौज ने हमला किया था। इस हमले से बचने के लिए उसको गोलियां चलानी पड़ीं। लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर ने उसके निर्णय को सही ठहराया। इसके बाद गवर्नर डायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगा दिया।

दुनियाभर में हत्याकांड की निंदा

इस हत्याकांड की दुनियाभर में निंदा हुई। इससे सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉंटेग्यू पर दबाव बना और उन्होंने इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया। जांच में जनरल डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का निर्णय पहले से ही ले चुका था। वह दो तोपें भी अपने साथ ले कर गया था, हालांकि रास्ता संकरा होने के कारण तोप बाग तक नहीं जा पाई थीं। हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद ब्रिगेडियर जनरल डायर को कर्नल बना दिया गया और उसे भारत से बाहर भेज दिया गया। भारत में डायर के खिलाफ गुस्से को देखते हुए ब्रिटिस सरकार ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया।

ब्रिटेन में हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए जनरल डायर का प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। हालांकि, हाउस ऑफ कॉमंस ने डायर के खिलाफ निंदा का प्रस्ताव पारित किया था। अंत में दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और 1920 में जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने इस्तीफा दिया।

Posted By: Arvind Dubey

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