दिन - 12 जून 1975

समय - सुबह 10 बजे

स्थान - इलाहाबाद हाईकोर्ट, कमरा नंबर 24

मुकदमा - इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण

उस दिन आग बरसते सूरज की तपिश के धीरे-धीरे तल्ख होने के साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में गहमा-गहमी और खुसुर-फुसुर शुरू हो गई। जैसे ही 10 बजे जज जगमोहन लाल सिन्हा कोर्ट रूम में आए, सभी ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया। अदालत की कार्रवाई शुरू होते ही जज सिन्हा ने साफ कर दिया कि वो इंदिरा गांधी को बख्शने के मूड में नहीं हैं। याचिकाकर्ता राजनारायण ने जिन सात मुद्दों को कोर्ट के सामने पेश किया था, उनमें से पांच में इंदिरा गांधी को राहत दे दी गई, लेकिन दो मुद्दों ने उनकी तकदीर का फैसला कर दिया और वह दोषी करार दे दी गईं। फैसला दिया गया कि जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत अगले छह सालों तक इंदिरा गांधी लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकती हैं।

फैसला लिखते वक्त शायद जज जगमोहन लाल सिन्हा को भी इस बात का कतई गुमान नहीं था कि वह हिंदुस्तानी जम्हूरियत की तकदीर का फैसला लिख रहे हैं। 12 तारीख का यह फैसला तवारिख में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क की सबसे कद्दावर नेता के पर कतरते हुए उनको इस बात का अहसास कराया गया कि यह देश संविधान के दायरे में लोकतांत्रिक मूल्यों के मुताबिक चलेगा।

क्या था राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मामला

आइए अब गौर करते हैं उस मामले पर आखिर क्यों राजनारायण ने अपनी हार से हताश होकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था? 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के सामने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण खड़े हुए थे। राजनारायण को इंदिरा गांधा ने भारी बहुमत से हरा दिया। शिकस्त खाए राजनारायण को यह हार हजम नहीं हुई, क्योंकि वह अपनी जीत के प्रति इतने ज्यादा आश्वस्त थे कि उन्होंने नतीजे का इंतजार किए बगैर अपना विजय जुलूस निकाल दिया था, लेकिन इस करारी हार ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

राजनारायण ने इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया और आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया है, लिहाजा उनका चुनाव निरस्त किया जाए। मार्च 1975 में जस्टिस सिन्हा की अदालत में दोनों पक्षों की ओर से दलील पेश की गई। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जज सिन्हा ने इंदिरा गांधी को अदालत में अपना बयान दर्ज कराने के लिए 18 मार्च 1975 की तारीख मुकर्रर की।

यह आजाद हिंदुस्तान के इतिहास में पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री को किसी मुकदमे के सिलसिले में अदालत में पेश होना पड़ा था।

मामला हिंदुस्तान और दुनिया की सबसे नामचीन शख्सियत के अदालत में पेश होने का था इसलिए सभी की निगाहें इस पर टिकी हुई थीं, लेकिन जस्टिस सिन्हा इन सभी बातों से बेखबर अदालती तौर तरीकों को बरकरार रखने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। उन्होंने कोर्ट रूम में उपस्थित लोगों को सख्त हिदायत दी कि इंदिरा गांधी के आने पर कोई भी शख्स खड़े होकर उनको सम्मान न दे, क्योंकि अदालत में पेश होने वाला शख्स सिर्फ आम आदमी होता है।

इंदिरा गांधी से सवाल-जवाब का सिलसिला पांच घंटे तक चलता रहा। इसके साथ ही उनके समर्थकों को इस बात का अहसास हो गया कि अदालत का फैसला उनके खिलाफ जा सकता है।

अब शुरू हुआ जस्टिस सिन्हा को प्रभावित करने का दौर। इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जी एस माथुर इंदिरा गांधी के निजी डॉक्टर केपी माथुर के करीबी रिश्तेदार थे। राजनारायण की पैरवी कर रहे वकील शांतिभूषण का कहना है कि खुद चीफ जस्टिस माथुर अपनी पत्नी के साथ जज सिन्हा के घर गए थे और उनको यह पेशकश की थी कि यदि वह इस मामले में राजनारायण के खिलाफ फैसला सुनाते हैं तो उनको तत्काल पदोन्नत करते हुए सुप्रीम कोर्ट भेज दिया जाएगा, लेकिन जस्टिस सिन्हा किसी और मिट्टी के बने हुए थे।

उन्होंने तथ्यों पर गौर करने के बाद मुल्क की दिशा और दशा बदलने वाला ऐतिहासिक फैसला दे दिया। 22 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट में मामला आया। 24 जून को जस्टिस अय्यर ने फौरी राहत देते हुए पूर्ण की बजाय आंशिक स्थगन दे दिया। 25 जून को जयप्रकाश नारायण की दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली हुई और इसके बाद जो हुआ वह इतिहास के पन्नों में काले अध्याय के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। अदालती कार्रवाई से आहत होकर इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था। जनतांत्रिक मूल्य जमींदोज हो गए थे और देश के अवाम की आवाज को हाशिए पर धकेल दिया गया था।

प्रस्‍तुति : योगेंद्र शर्मा

Posted By: Arvind Dubey