नई दिल्ली। भारत की संसद पर हुए आतंकी हमले को आज 18 साल हो चुके हैं। 13 दिसंबर 2001 को भारत की संसद पर आतंकियों ने जो हमला किया था उसका जख्म अब भी ताजा है। इतने साल बीत गए लेकिन आज भी देश की अस्मत पर हुए उस हमले का निशान कायम है। जिस वकत् यह हमला हुआ किसी को भनक तक नहीं लगी और आतंकी घुस आए। वो बाहर गोलियां और बम बरसा रहे थे और संसद में सांसद समझ रहे थे कि कोई पटाखे चला रहा है। चलिए हम उस काले दिन की कहानी बताते हैं। कब और क्या हुआ।

पढ़िए कैसे संसद में घुसे आतंकी और कर दिया हमला

संसद के शीतकालीन सत्र का समय था और रोजाना की तरह संसद में कामकाज शुरू हो चुका था। दोनों सदन आतंकियों द्वारा की गई गोलीबारी से कुछ देर पहले ही स्थगित हुए थे। इसी बीच सुबह 11.25 बजे एके-47 बंदूकों और हैंड ग्रेनेड से लैस पांच आतंकियों ने हमला बोल दिया। उस समय तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी अपने मंत्रियों और करीब 200 सांसदों के साथ संसद में मौजूद थे।

देश की संसद को निशाना बनाने के लिए यह आतंकी लालबत्ती वाली एंबेसेडर कार से आए थे जिस पर गृह मंत्रालय का स्टीकर लगा हुआ था। अंदर आने के बाद जैश-ए-मुहम्मद के पाचों आतंकी पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाकर गोलिया बरसा रहे थे। सभी आतंकियों के हाथ में एके 47 रायफलें थीं और उनकी पीठ पर बैग था। एक आतंकी ने हमले के दौरान अपने शरीर पर रखे बम को विस्फोट कर उड़ा दिया था।

जिस वक्‍त आतंकी गोलिया चला रहे थे उस वक्‍त कुछ सांसदों को लगा कि पटाखे छोड़े जा रहे हैं। लेकिन जल्‍द ही इस बात का अंदाजा सभी को हो गया था कि यह पटाखों की आवाज नहीं बल्कि आतंकियों द्वारा की जा रही फायरिंग की आवाजें थीं।

गोलियों की आवाज और पाकिस्तान के पक्ष में लग रहे नारों के सुरक्षाकर्मियों ने मोर्चा संभाल लिया और संसद के सुरक्षा स्टाफ ने मुख्य इमारत को फौरन चारों तरफ से बंद कर दिया। सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों, बम निरोधक दस्ते और पुलिस ने मोर्चो संभाल लिया, ताकि एक भी आतंकी मनमानी न कर सके और भाग कर जाने भी न पाए।

करीब 14 मिनट तक चले इस मुकाबले के बाद हमला नाकाम कर दिया गया और पाचों आतंकी मारे गए, जबकि नौ जाबाज जवान शहीद हो गए।

हमले के दौरान देश के कई बड़े नेता और सासद संसद भवन के परिसर में ही थे और सभी सुरक्षित थे। उस समय राजग सरकार सत्ता में थी। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। इस हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्ते काफी खराब हो गए थे। दोनों देश युद्ध के करीब आ गए थे।

इस हमले को अंजाम देने के लिए आतंकियों ने 13 दिसंबर का दिन इसलिए भी चुना था क्‍योंकि उस वक्‍त संसद सत्र चल रहा था और अधिकतर सांसद सदन में मौजूद थे। उस दिन ताबूत घोटाले को लेकर विपक्ष का हंगामा अपने चरम पर था।

हमले के बाद ढेर सारे सवाल सुरक्षा को लेकर उठने लगे थे। उस वक्त दिल्ली पुलिस कमिश्नर रहे अजय राज शर्मा के मुताबिक संसद गेट पर मौजूद गार्ड ने थोड़ी सावधानी बरती होती हो यह हादसा रोका जा सकता था। एक टीवी चैनल से बातचीत में शर्मा ने कहा था कि आतंकियों की कार पर गृह मंत्रालय का स्टीकर लगा था, लेकिन उस पर कुछ अपशब्द भी लिखे थे जिसे संसद भवन के गेट पर मौजूद गार्ड नहीं नोटिस कर सके। यदि उन्होंने इसे नोटिस किया होता तो कार को घुसने से रोक सकते थे।

उस वक्त तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गाधी संसद भवन से बाहर निकल चुकी थीं लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित अधिकतर नेता संसद में ही मौजूद थे। हालाकि सुरक्षाकर्मियों ने सदन के सभी दरवाजे बंद कर दिए थे।

हमले के दोषी ठहराए गए अफजल गुरु को आज से 6 साल पहले इश मामले में फांस दे दी गई थी।

Posted By: Ajay Barve

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