नई दिल्ली। लगभग ढाई दशक बाद एक बार फिर यूपी की सियासत में सपा और बसपा का गठबंधन हुआ है। लोकसभा चुनाव के पहले इस गठबंधन पर सबकी नजरें हैं। सवाल यह भी है कि क्या यह गठबंधन एक बार फिर वही नतीजे देगा जो 22 साल पहले दिए थे।

उस दौरान हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद दोनों ही दलों की राहें अलग हो गईं थी और तब से लेकर अब तक दोनों राजनीतिक विरोधी ही रहे। यह वो वाकया है जो 22 साल पहले हुआ था और जिसे प्रदेश की राजनीति के इतिहास का काला दिन भी कहा जाता है।

गेस्‍ट हाउस कांड के नाम से जाने जाने वाले इस मामले में अराजकता तब चरम पर पहुंच गई थी जब दलित नेता मायावती उन्‍मादी भीड़ के चंगुल में फंस चुकी थीं। यह सब तब हुआ जब मायावती ने मुलायम सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। आइये हम आपको बताते हैं कि क्‍या है गेस्‍ट हाउस कांड।

गेस्‍ट हाउस कांड

1993 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद समाजदवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन हुआ था। चुनाव में गठबंधन को जीत हासिल हुई थी और मुलायम सिंह यादव मुख्‍यमंत्री बने थे।

मतभेद के कारण बसपा ने समर्थन वापस ले लिया और मुलायम की सरकार संकट में आ गई। सरकार बचाने के प्रयास विफल हुए तो सपा के कार्यकर्ता आक्रोशित होकर राज्‍य के गेस्‍ट हाउस पहुंचे।

वहां बसपा की मायावती ठहरी हुई थीं। बताया जाता है कि उन्‍मादी भीड़ ने उनके साथ मारपीट की व कपड़े भी फाड़ दिए। तब भाजपा विधायक बीडी द्विवेदी ने मायावती को बचाया और गेस्‍ट हाउस से उनको सुरक्षित बाहर निकलवाकर ले गए। इसे ही गेस्‍ट हाउस कांड कहा जाता है।

द्विवेदी के खिलाफ कभी उम्‍मीदवार खड़ा नहीं किया

इस घटना के बाद मायावती ने द्विवेदी को बड़े भाई तुल्‍य माना और उनके सम्‍मान में कभी भी उनके विरुद्ध अपना कोई प्रत्‍याशी खड़ा नहीं किया। उनके प्रति मायावती के आभार का ये आलम था कि भले ही वे प्रदेश में भाजपा का विरोध करतीं लेकिन फर्रूखाबाद में तो वे द्विवेदी के पक्ष में ही प्रचार किया करती थीं।

कुछ समय बाद एक गोली कांड में द्विवेदी की हत्‍या हो गई। इससे मायावती बेहद दुखी हुईं। बाद में उन्‍होंने द्विवेदी की विधवा के लिए भी जनता से सहयोग की अपील की।

आरोपी को ही टिकट देने पर विवाद

मायावती 2009 में तब फिर विवादों में आई जब उन्‍होंने गेस्‍ट हाउस कांड के एक आरोपी को ही टिकट दे दिया। उस हमले में सपा कार्यकर्ता शामिल थे और एक हमलावर अन्‍ना शुक्‍ला था। अन्‍ना एक कुख्‍यात गैंगस्‍टर रहा था और कई बार जेल भी जा चुका था। दिसंबर 2008 में वह सपा में शामिल हो गया।

बनना चाहती थीं कलेक्‍टर

मायावती पहले स्‍वयं कलेक्‍टर बनना चाहती थीं। वह आईएएस की तैयारी कर रही थीं। कांशीराम ने उन्‍हें प्रोत्‍साहित करते हुए कहा था कि तुम्‍हारे भीतर अच्‍छी संभावनाएं हैं।

तुम खुद कलेक्‍टर बनना चाहती हो जबकि एक दिन कई कलेक्‍टर तुम्‍हारे अधीन होंगे। मेरे साथ चलो। यह सुनकर मायावती के पिता ने उन्‍हें घर से निकाल दिया था। हालांकि पहले चुनाव में कांशीराम व मायावती को असफलता मिली लेकिन बाद में तो मायावती चार बार मुख्‍यमंत्री पद पर रहीं।