भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहां जब आम चुनाव होते हैं तो पूरी दुनिया की निगाहें यहां लगी रहती हैं, क्योंकि हमारे देश में सबसे अधिक जनसंख्या मतदान में हिस्सा लेकर अपने लिए सरकार चुनती है। किंतु भारत के लिए आजादी के ठीक बाद चुनाव करवाना न तो इतना आसान था और न ही निष्पक्ष। यहां तक कि देश के पहले आम चुनाव में तो तत्कालीन शीर्ष चुनाव अधिकारी द्वारा जानबूझकर 28 लाख महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटवा दिए गए थे। दुर्भाग्य तो यह कि इस कवायद को तब 'अच्छा' माना गया था।

किस्सा सन्‌ 1952 में हुए भारत के पहले लोकसभा चुनावों का है। देश को तब स्वतंत्र हुए कुछ ही वर्ष हुए थे। तब न पर्याप्त संसाधन थे, न ही चुनाव करवाने के लिए पर्याप्त संख्या बल। ऐसे में भी तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू प्रशासन ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए देश में चुनाव करवाने का निर्णय लिया। इसके लिए सुकुमार सेन नामक एक आईसीएस अधिकारी को मुख्य चुनाव अधिकारी बनाकर चुनाव करवाने का जिम्मा सौंपा गया। सेन अच्छे गणितज्ञ थे, लेकिन इंग्लैंड में पढ़े होने के चलते वे अंग्रेजीमानसिकता के व्यक्ति थे। उन्होंने यह चुनौती स्वीकार तो कर ली, लेकिन वे भोले-भाले भारतीय जनमानस से वैसा तालमेल नहीं बैठा पाए, जैसी जरूरत थी।

बहरहाल, सेन ने उस समय के 17 करोड़ 60 लाख मतदाताओं से मतदान करवाने का अभियान प्रारंभ किया। देश में 224,000 मतदान केंद्र बनाए गए, 8200 टन इस्पात गलाकर मतपेटियां बनवाई गईं, छह माह के अनुबंध पर 16500 क्लर्क भर्ती किए गए, ताकि वे चुनाव करवा सकें। तब कुल 4500 सीटों पर चुनाव होने थे, जिनमें 500 सीटों पर संसद के लिए तथा अन्य सीटें राज्यों की विधानसभाओं के लिए थीं। किंतु दिक्कत तब हुई जब मतदाता सूची बनी। अ

नपढ़ महिलाएं सूची में अपना नाम लिखवाने के बजाय पति या बेटे का नाम लिखवाती थीं। जब यह बात सेन को पता चली तो उन्होंने ऐसी 28 लाख महिलाओं के नाम एक झटके में मतदाता सूची से हटाने के निर्देश दे दिए। इस तरह ये महिलाएं योग्य होने के बावजूद देश के पहले चुनाव में मतदान नहीं कर सकीं।

Posted By: Arvind Dubey

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