अयोध्या। अब देश की नजर अयोध्या पर है। 6 दिसंबर 1992 से अब तक अयोध्या का यह विवाद लगातार देश में चर्चा का केंद्र बना रहा। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि अयोध्या में पहली बार मंदिर-मस्जिद विवाद में 1853 को हिंसा भड़की थी। यह जानकारी भी कम रोचक नहीं है कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच उस दौरान हुए संघर्ष के बाद ही यहां राम चबूतरा और सीता रसोई का निर्माण किया गया था।

अंग्रेजों ने किया कब्जा तो यह थी व्यवस्था

1859 में अंग्रेजों ने इस विवादित जमीन को अपने कब्जे में कर लिया था। तब भीतरी परिसर मुस्लिम इस्तेमाल करने लगे और बाहरी परिसर का इस्तेमाल हिंदू करने लगे। 1885 में मामले ने तब तूल पकड़ा जब महंत रघुबर दास ने राम चबूतरा के ऊपर छत्र लगाने की इजाजत मांगते हुए एक याचिका दायर की। हालांकि इस पर किसी तरह की गंभीर सुनवाई नहीं हुई।

आजाद भारत में सरकार ने लगा दिया था ताला

1949 तक अयोध्या इसी तरह चलती रही, तभी कुछ ऐसा हुआ कि विवाद बढ़ गया। उस साल परिसर में भगवान राम की मूर्ति स्थापित कर दी गई। इसके बाद सरकार ने इस स्थल को विवादास्पद घोषित करते हुए ताला लगा दिया। अगले साल भीतरी परिसर के दरवाजों पर ताला था, लेकिन पूजा की अनुमति दे दी गई। इसके नौ साल बाद यानी 1959 में निर्मोही अखाड़ा और महंत रघुनाथ ने याचिका दायर की कि समुदाय को पूजा करने की जिम्मेदारी दी जाए। वहीं 1961 में सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने मस्जिद पर दावा करते हुए कहा कि इसके चारों ओर का इलाका कब्रिस्तान का है।

दरवाजे खुले, मिला पूजा का अधिकार

1984 में विश्व हिंदू परिषद ने मस्जिद के ताले खोलने के लिए व्यापक आंदोलन चलाया। परिणामस्वरूप 1 फरवरी 1986 को फैजाबाद के सत्र न्यायाधीश ने हिंदुओं को इस स्थल पर पूजा करने की अनुमति दी। दरवाजे दोबारा खोल दिए गए। विरोधस्वरूप मुस्लिमों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया था। इसके बाद के सालों में विहिप ने आंदोलन जारी रखा और 1989 में मस्जिद के निकट राम मंदिर के लिए शिलान्यास किया। 9 नवंबर 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादास्पद स्थल पर शिलान्यास की अनुमति दी। इसके बदा लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या के लिए रथ यात्रा शुरू की। 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में आई। इसके बाद 1992 में जो कुछ वो सबके सामने है।

Posted By: Arvind Dubey