अयोध्या। अयोध्या का मसला सदियों से तारीख और तवारीख की भूलभूलैया में घूमता रहा है। अयोध्या के अतीत में यदि झांक कर देखे तो अयोध्या के नाथ हमेशा से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम रहे हैं। बदलते दौर को साथ दूसरे धर्मों के आराध्यों और संतों ने भी इस जमीन पर कुछ वक्त गुजारा और इतिहास के पन्नों में अपना नाम अमर किया। इनमें जैन और बौद्ध धर्मों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

अयोध्या से हमेशा सनातन संस्कृति का संदेश निकलकर आया है, लेकिन सन् 1528 में अयोध्या में जिस विवाद का जन्म हुआ था उसने बदलते दौर के साथ विकराल रूप धारण कर लिया। उसके बाद से मशहूर लेखकों ने राम जन्म भूमि विवाद की व्याख्या अपने-अपने हिसाब से की। तकरीबन सभी ने इस बात की ताकिद की कि अयोध्या

में राम जन्मभूमि पर मंदिर को ढहाकर मस्जिद की तामिर करई गई थी। इन लेखकों में हिंदू, मुस्लिम और अंग्रेज, तीनों शामिल हैं।

मुस्लिम लेखकों की नजर में अयोध्या

सन् 1856 में मिर्जाजान ने अपनी किताब 'हदीकाए शहदा' (पृष्ठ-4-7) में लिखा है कि सुल्तानों ने इस्लाम के प्रचार और प्रतिष्ठा को शह दी। कूफ्र (हिन्दू विचार) को कूचला। फैजाबाद और अवध को कूफ्र से छुटकारा दिलवाया। अवध राम के पिता की राजधानी थी। जिस स्थान पर मंदिर था वहां बाबर ने सरबलंद मस्जिद बनवाई।

हाजी मोहम्मद हसन ने 1878 में छपी अपनी किताब 'जियाए अख्तर' (पृष्ठ 38-39) में लिखा है कि अलहिजरी 923 में राजा राम चन्दर के महल सराय तथा सीता रसोई को ध्वस्त कर दिल्ली के बादशाह के हुक्म से बनाई गई मस्जिद में अब दरारें पड़ गई हैं।

शेख मोहम्मद अजमत अली कांकरोली ने 1869 में 'तारीखे अवध' और 'मुरक्काए खुसरवी' नामक किताबों में भी मंदिर की जगह मस्जिद बनाने का जिक्र किया है। मौलवी अब्दुल करीम ने 1885 में 'गुमगश्ते हालत अयोध्या अवध' में कहा है कि राम जन्म स्थान और रसोई की जगह बाबर ने एक अजीम मस्जिद बनवाई। कमालुद्दीन हुसनी

अल हुसैनी अल मशाहदी ने 1896 में लिखी किताब 'कैसरूल तवारीख' के खंड 2 (पृष्ठ 100-112) में मंदिर तोड़े जाने का जिक्र किया है। अल्लामा मुहम्मद नजमुलगनी खान रामपुरी ने 1909 में लिखी गई 'तारीखे अवध' के खंड 2 (पृष्ठ 570-575) में भी मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद की तामीर का जिक्र किया है।

'आइने अकबरी' में लिखा है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि को वापस पाने के लिए हिन्दूओं ने कई हमले किए। औरंगजेब की 'आलमगीर' में कहा गया है कि मुतवातिर 4 साल तक खामोश रहने के बाद रमजान की सातवीं तारीख पर शाही फौज ने फिर अयोध्या की जन्मभूमि पर हमला किया, जिसमें 10 हजार हिंदू मारे गए।

अंग्रेज इतिहासकारों की नजर में अयोध्या विवाद

विलियम फोस्टर की 1921 में प्रकाशित बुक 'ट्रेवल्स इन इंडिया- 1583 से 1619' (पृष्ठ 176) में कहा गया है कि विलियम फिंच नाम का यूरोपीय यात्री 1608 से 1611 तक भारत में रहा और उस वक्त उसने अयोध्या की यात्रा की थी। उसने अयोध्या में रामगढ़ी के खंडहरों का जिक्र किया था और कहा था कि हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान राम ने यहां जन्म लिया था।

ऑस्ट्रिया के टाइफेनेथेलर सन 1766 से 71 में अयोध्या में रहे थे। उन्होंने कहा कि 'अयोध्या में बाबर ने राम जन्मभूमि पर मंदिर को ध्वस्त कर उसके नक्काशीदार खंभों से मस्जिद को बनवाया। मुगलों द्वारा रोकने के बावजूद हिंदू इस स्थान पर पूजा के लिए आते हैं।' इसका वर्णन 'डिस्क्रिप्शन हिस्टोरिक एंड ज्योग्राफिक' ( पृष्ठ 253-254) पर दर्ज है।

ब्रिटिश सर्वेक्षणकर्ता मान्टगोमरी ने 1838 में 'मार्टिन हिस्ट्री एन्टीक्विटीज टोपोग्राफी एण्ड स्टेटिस्टिक्स ऑफ इस्टर्न इंडिया' के खंड-2 में (पृष्ठ 335-36) में लिखा है कि मस्जिद में इस्तेमाल किए गए स्तम्भ राम मंदिर से लिए गए हैं। एडवर्ड थार्नटन ने 'गजेटियर ऑफ दि टेरिटेरीज अंडर द गर्वनमेंट ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी' (पृष्ठ 739-40) में लिखा है कि बाबरी मस्जिद पुराने हिंदू मंदिर के 14 खंभों पर बनाई गई है।

बाल्फोर ने 'बाल्फोर एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडिया एंड ऑफ ईस्टर्न एन्ड सदर्न एशिया' (पृष्ठ 56) में कहा है कि अयोध्या की तीन मस्जिदें तीन हिंदू मंदिरों पर बनी हैं। ये मंदिर हैं, राम जन्म स्थान, स्वर्गद्वार और त्रैता का ठाकुर।

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के 1978 में छपे 15 वें संस्करण खंड 1 (पृष्ठ 693) में बाबरी मस्जिद से पहले एक मंदिर होने की बात कही है। पी कार्नेगी 'हिस्टोरिकल स्केच ऑफ फैजाबाद विद द ओल्ड कैपिटल्स- अयोध्या एन्ड अयोध्या' ( पृष्ठ 5-7, 19-21) में बाबर द्वारा मंदिर की सामग्री से मस्जिद बनाने का जिक्र किया है। 1877 के 'गजेटियर ऑफ दि प्रोविंस ऑफ अवध' के खंड 1 ( पृष्ठ 6-7) में इन तथ्यों की पुष्टी की गई है। 1880 की फैजाबाद सेटलमेंट रिपोर्ट में भी इन तथ्यों को सही करार दिया गया है।

इतिहास के विद्वान कनिंघम ने 'लखनऊ गजेटियर' में लिखा है कि अयोध्या में राम मंदिर तोड़े जाते समय हिन्दूओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी। इस भीषण लड़ाई में 1 लाख 74 हजार हिंदूओं की लाशें बिछ जाने के बाद ही बाबर का सेनापति मीर बाकी तोपों के जरिए मंदिर को जमीदोज कर पाया था।

इसके साथ ही बाबू साधुचरण प्रसाद ने 1892 के यात्रा वृंतात पर लिखी गई अपनी किताब भारत भ्रमण के द्वितीय खण्ड (पृष्ठ 283) में अयोध्या में राम मंदिर की जगह बाबर द्वारा मस्जिद बनाए जाने का जिक्र है।

(संकलन: योगेंद्र शर्मा)

Posted By: Arvind Dubey