डॉ. भरत रावत।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम, जोकि उनके आर्थिक विजन का हिस्सा है, को मेडिकल उपकरणों तक विस्तारित किया गया, तो इसे घरेलू मेडिकल उपकरण मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूती देने के लिए एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया। इसके बाद जो चित्र सामने आया, वो यह था कि मेक इन इंडिया बैनर के तले कई मैन्यूफैक्चरर्स ने ग्लोबल ब्रांड्स की बराबरी पर होने का दावा किया। उदाहरण के लिए, कई भारतीय ब्रांड द्वारा कार्डिएक स्टेंट लॉन्च किए गए जिनकी तुलना ग्लोबल बाज़ार में गोल्ड स्टैंडर्ड वाले स्टेंट से की गई। जहां एक ओर मैं घरेलू मैन्यूफैक्चरर्स के बाजार में प्रवेश करने का पूरी तरह समर्थन करता हूं, वहीं दूसरी ओर हमारे लिए, एक डॉक्टर के तौर पर भूगोल एक हार्ट स्टेंट की सुरक्षा और विश्वसनीयता का फैसला नहीं कर सकता। इसके लिए मजबूत क्लिनिकल ट्रायल्स जरूरी है।

इसे मैं अपने एक सबसे ताजा मामले से समझाता हूं। एक बुजुर्ग डायबिटिक महिला जिनकी केवल एक किडनी काम करती है, वो दोनों घुटनों के लिए नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की योजना बना रही थी। बेहद कम मूवमेंट करने पर भी उनमें एंजिना की बार-बार पीड़ादायक समस्या आ रही थी। हमने ऑपरेशन से पहले एंजियोग्राम किया जिसमें एक प्रमुख धमनी (आर्टरी) में काफी ज़्यादा कड़ेपन के साथ गंभीर अवरोध देखा गया। हमने इलेक्टिव मेजर सर्जरी को आगे टालने का फैसला किया क्योंकि एंजियोप्लास्टी के बाद हमें उन्हें एक साल के लिए खून को पतला करने वाली दोगुना दवाईयों पर रखना पड़ता। हालांकि उन्होंने जल्द से जल्द सर्जरी कराने पर जोर दिया क्योंकि उन्हें काफी ज़्यादा दर्द हो रहा था।

मैंने उनके परिवार के साथ चर्चा की और हमने एंजियोप्लास्टी करने का फैसला किया। अब इस परिस्थिति में हमें एक ऐसे स्टेंट का चुनाव करना था जो न केवल कड़क हो चुकी धमनी में इम्प्लांट किए जाने के लिए पर्याप्त रूप से मज़बूत हो बल्कि डबल ब्लड थिनर्स के कम समय के लिए इस्तेमाल पर पर्याप्त डाटा मौजूद हो, जिसकी ज़रुरत थी। हमने एक अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड का विकल्प चुना जिसे यूएस फूड एंड ड्रग एसोसिएशन (एफडीए) की मान्यता प्राप्त थी।

मैं जिस मुद्दे की ओर ध्यान खींचना चाहता हूं, वो यह कि विभिन्न मरीज़ों की ज़रुरतें अलग अलग तरह की होती हैं। हम केवल उसके निर्माण की भौगोलिकता के आधार पर घरेलू स्टेंट का ही विकल्प नहीं चुन सकते। सबसे बड़ा सवाल है : हमारे मरीज़ों को हम किस तरह की देखभाल की गुणवत्ता उपलब्ध करा रहे हैं?

हाल ही में हमने कुछ घरेलू ब्रांड को कुछ ग्लोबल ब्रांड्स की ही तरह सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते देखा। ये बहुत क्रांतिकारी लगता है और इस तरह के दावे सुर्खियाँ में रहते हैं। हालाँकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।

आईए इसे एक अन्य ब्रांड के उदाहरण के साथ समझते हैं जो देश का सबसे पहला स्थानीय तौर पर बना बायोरिसॉर्बेबल कार्डिएक स्कैफोल्ड होने का दावा करता है, जिसकी सरकार के साथ प्राइज़ कैप से बाहर रखे जाने के लिए चर्चा जारी रहने की जानकारी है। मौजूदा समय में ये बाज़ार में नहीं है, लेकिन इसे लॉन्च किए जाने की पूरी तैयारियाँ की जा चुकी है। 108 मरीजों पर किए गए अध्ययन में क्लिनिकल ट्रायल्स में उपकरण ने बेहतर परिणाम दिखाए गए हैं। एक ऐसे देश में जहां दिल की बीमारियों के चलते सबसे ज़्यादा लोगों की मौतें होती है, 2016 में 17 लाख भारतीयों की मृत्यु हुई है, क्या ये सैंपल साइज़ एक ऐसे प्रॉडक्ट की मंजूरी के लिए पर्याप्त है जो आखिरकार लाखों लोगों के लिए उपलब्ध होगा? 150 रिसर्च और डेवलपमेंट (आरएंडडी) इंजीनीयर्स और 108 मरीजों के सैंपल के साथ क्या इसका शोध बड़े क्लिनिकल डाटा और लंबे समय के फॉलो अप के साथ इसका समर्थन करता है? यदि छूट के लिए इसे सरकार की मंजूरी दी जाती है, तो इसे एक पक्षपातपूर्ण उपचार के मामले की तरह देखा जाएगा।

अवसरों का लाभ उठाते हुए अपना महत्व साबित करने के लिए और नए नए प्रॉडक्ट लॉन्च कर घरेलू मैन्यूफैक्चरर्स के लिए भले ही ये एक अनुकूल समय लगे, लेकिन आखिर किस कीमत पर? इस प्रक्रिया में हम ज़िदगियाँ नहीं खो सकते। मरीज़ों की सुरक्षा खतरे में है।

इस तरह के दावे करने से पहले लोगों को सही तस्वीर पेश किया जाना महत्वपूर्ण है। इससे पहले कि इस तरह के फैसले किए जाएं, ये समय की ज़रुरत है कि व्यवस्थित शोध से सर्वश्रेष्ठ बाह्य क्लिनिकल सबूतों का इस्तेमाल किया जाए।

ये सराहनीय है कि सरकार द्वारा नियमन और नीतिगत ढांचे को मज़बूत करने और स्थानीय आर एंड डी और कौशल विकास को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि भारत को सबसे ज़्यादा ऐसी मेडिकल कंपनियों की ज़रुरत है जिनके पास उच्च गुणवत्ता वाले इंफ्रास्ट्रक्चर और शोध आधारित प्रॉडक्ट के मज़बूत प्रॉडक्ट पाइपलाइन में मौजूद हैं।

इससे पहले ये कहा जाए कि उपकरण मौजूदा टेक्नोलॉजी और स्टेंट से बेहतर है, एक बायोरिसॉर्बेबल स्टेंट को कई वर्षों तक हजारों मरीज़ों को फॉलो करने की ज़रुरत होती है। सशक्त क्लिनिकल डाटा उपलब्ध न होने पर ब्रांड द्वारा किए गए ऊंचे दावे औंधे मुहं गिरते हैं। खुले तौर पर ये दावा करना कि एक स्टेंट विदेशों में मिलने वाले इस तरह के स्टेंट से बेहतर है, इससे भारत में केवल स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को नुकसान होगा।

जब हम एक मरीज़ के लिए स्टेंट को चुनते हैं, तो ये इसके निर्माण करने में निवेश किए गए विज्ञान, शोध और टेक्नोलॉजी पर निर्भर करता है । इस दिशा में सबसे पहला महत्वपूर्ण कदम है क्लिनिकल डाटा। क्लिनिकल ट्रायल्स मरीज़ों की उल्लेखनीय संख्या पर किए जाने चाहिए – जो स्टेंट की सफलता दर को स्थापित करने के लिए एक अनिवार्यता है। आवश्यक विश्वसनीयता हासिल करने के लिए ट्रायल्स का व्यापक और विस्तृत होना ज़रुरी है। इसके साथ ही स्टेंट के विभिन्न वर्गों में, जहां कीमतों में कोई उलेलखनीय अंतर नहीं है, एफडीए द्वारा मंजूर ब्रांड को न चुनने के लिए कोई भी मज़बूत वजह नहीं है।

आज हम एक ऐसे देश हैं जहां बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है, आय के स्तर में वृद्धि हो रही है और जीवनशैली से संबंधित रोगों का प्रचलन बढ़ा है। बदलते समय के साथ हमें लगातार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रुरत होगी और इसके साथ ही अत्‍याधुनिक उपकरणों और यंत्रों की व्‍यापक श्रृंखला की भी आवश्‍यकता पड़ेगी।

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा मेडिकल उपकरण का बाज़ार आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है और ऐसा क्यों है इसके लिए भी एक वजह है। एक डॉक्टर के तौर पर मेरे लिए मरीज़ की सुरक्षा सबसे पहले और सर्वोपरि है। यदि मुझे पता है कि एक स्टेंट का विस्तृत रुप से परीक्षण नहीं किया गया है, तो इसका इस्तेमाल कर मैं मरीज़ की जान धोखे में नहीं डालूंगा और इसका मैन्‍युफैक्‍चरर कौन है और कहां रहता है, यह कतई मायने नहीं रखता है।

(लेखक मेदांता सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, इंदौर में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट में एसोसिएट डायरेक्टर हैं।)

Posted By: Arvind Dubey

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