भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जीवनभर अनीश्वरवादी बने रहे। उन्होंने कभी स्वयं को किसी धर्म की परिधि में नहीं बांधा। मगर आश्चर्य यह कि अपनी अ-धार्मिक प्रवृत्ति के बावजूद उनके ब्रीफकेस में हमेशा हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता की एक प्रति रखी रहती थी। इसका खुलासा तब हुआ, जब नेहरू की असमय मृत्यु हो गई। वस्तुत: नेहरू ने अपने पूरे जीवनकाल में धर्मनिरपेक्षता का विचार ही स्थापित किया और कभी भी धर्म के प्रति रुझान नहीं दिखाया। यहां तक कि 21 जून 1954 में लिखी गई अपनी वसीयत तक में उन्होंने स्पष्ट लिखा था, 'मैं पूरी संजीदगी के साथ घोषणा कर रहा हूं कि अपनी मृत्यु के बाद किसी तरह की धार्मिक रस्में नहीं चाहता। मैं मृत्यु की रस्मों में विश्वास नहीं करता और सिर्फ एक तौर-तरीके के रूप में भी उनको स्वीकार करना पाखंड और स्वयं को धोखा देने जैसा होगा।"

उनकी यह वसीयत भी स्पष्ट करती है कि वे अ-धार्मिक थे। किंतु उनकी मृत्यु के बाद पता चला कि वे हमेशा अपने साथ ब्रीफकेस में गीता और संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की एक संक्षिप्त प्रति साथ रखते थे। आश्चर्य की बात यह भी कि स्वयं को जीवनभर धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने वाले नेहरू का अंतिम संस्कार पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों से हुआ। उनकी मृत्यु के बाद एक विशेष विमान राजधानी दिल्ली से धर्मनगरी काशी भेजा गया। यह विमान काशी के विद्वान पंडितों को नेहरू जी के अंतिम संस्कार की क्रिया संपन्न् करने के लिए लेकर दिल्ली लौटा।

पार्थिव शरीर को पवित्र करने के लिए गंगाजल भी छिड़का गया, जो कि एक धार्मिक रस्म है। यहां तक कि हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार के लिए विशेष तौर पर चंदन की लकड़ियां मंगवाई गईं और परंपरानुसार सबसे कम उम्र के निकटतम संबंधी (उनके नाती संजय गांधी) के हाथों चिता को अग्नि दिलवाई गई। स्वाभाविक रूप से यह सब नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी सहित उनके बेहद करीबी रहे कांग्रेस के राजनेताओं के सामने हुआ, लेकिन इन सभी ने धार्मिक रस्मों को स्वीकारा।

(कुलदीप नैय्यर लिखित 'एक जिंदगी काफी नहीं" से संपादित अंश)

Posted By: Arvind Dubey

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