रमेश शुक्ला "सफर", अमृतसर। अयोध्या तो भगवान राम जी की ही है। जब राम व अल्लाह में फर्क नहीं तो झगड़ा किस बात का। प्यार से ही अल्लाह और राम को जीता जा सकता है।

मंदिर-मस्जिद को लेकर छह दिसंबर, 1992 को उठे विवाद पर 22 साल बाद यह विचार पाकिस्तानी नागरिकों की तरफ से तब आए हैं जब बाबरी मस्जिद की पैरवी कर रहे हाशिम अंसारी का केस की पैरवी न करने का बयान चर्चा में है।

पाकिस्तानी भी मानते हैं कि मंदिर-मस्जिद के नाम पर सियासत भारत और पाकिस्तान दोनों में चमकी। उन्होंने इस तारीख (6 दिसंबर 1992) को दोनों मुल्कों के लिए सियासी तारीख बताई। अब सही वक्त आ गया है इसका हल निकलेगा।

पाकिस्तान के पेशावर के जमशेद हैदर, लाहौर की शाजिया खातून समेत पाकिस्तानी नागरिकों ने पाइटेक्स मेले में शिरकत के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की। लाहौर की जुबैदा असलम कहती हैं कि भारत-पाक के लोगों को बार्डर की सीमाएं भी बांध नहीं सकतीं। आतंकवाद का सामना मिलकर करना होगा।

नेपाल की पूजा भारती कहती हैं कि मिलकर रहें, ईमानदारी से रहें और मिल बांट कर खाएं। मजहब में देश को न बांटें। आतंक पर पाकिस्तान का कोई अंकुश नहीं रह गया है।

सरगोदा चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री के पूर्व प्रधान ए सामी साहनी कहती हैं कि पाकिस्तान ने जो बोया वही काट रहा है। पाकिस्तान हो या भारत दोनों देशों की अवाम मंदिर-मस्जिद में झगड़ा नहीं, बल्कि प्यार चाहती है।

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