नई दिल्ली। अयोध्या मामले में फैसले की घड़ी आ गई है। पहली बार पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने सुनवाई की है। इस बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हैं। जानिए इनके बारे में -

1. जस्टिस रंजन गोगोई: अक्‍टूबर 2018 को देश के 46वें मुख्‍य न्‍यायधीश का पद संभालने वाले रंजन गोगोई असम के पूर्व मुख्‍यमंत्री और कांग्रेसी नेता केसब चंद्र गोगोई के बेटे हैं। मुख्‍य न्‍यायधीश के तौर पर उनका कार्यकाल 17 नवंबर 2019 को खत्‍म होगा। गोगोई 1978 उन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत गुवाहटी हाईकोर्ट में वकालत से की थी। यहीं पर वह पहली बार फरवरी 2001 में स्‍थायी जज नियुक्‍त किए गए। सितंबर 2010 में उनका ट्रांसफर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया था। अप्रेल 2012 में वह सुप्रीम कोर्ट में जज बने थे। बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्‍चन से जुड़े आय के मामले और जेएनयू छात्रा कन्‍हैया कुमार पर हमले को लेकर दायर याचिका को खारिज करने से सुर्खियों में आए थे। इस याचिका के तहत हमले की जांच को एसआईटी गठित करने की मांग की गई थी।

इसके अलावा एक और चर्चित मामले की वजह से भी वह सुर्खियों में आए थे। यह मामला केरल की महिला सौम्‍या के साथ दुष्‍कर्म के बाद हत्‍या से जुड़ा था। इसमें गठित तीन जजों की बैंच में रंजन गोगोई के अलावा न्‍यायधीश प्रफुल सी पंत और न्‍यायधीश उदय उमेश ललित शामिल थे। इस खड़े पीठ ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें दोषी को फांसी की सजा दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के दोषी गोविंदास्‍वामी को मिली फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया था। इस फैसले को पूर्व न्‍यायधीश मार्कंडे काटजू ने विरोध कर इसको गलत बताया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके विचार पर जवाब मांगे जाने के बाद वह इससे पीछे हट गए थे। इसके अलावा 2017 में असम के असल वासी कौन है के मुद्दे पर भी उनका फैसला काफी चर्चित हुआ था।

इन सभी के अलावा रंजन गोगोई पर सभी का ध्‍यान जनवरी 2018 में उस वक्‍त गया था जब उनके साथ न्‍यायधीश चेलमेश्‍वर, एमबी लोकुर, कुरियन जोसफ ने सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार खुलेतौर पर मीडिया के समक्ष आकर मामलों का निस्‍तारण और मामले जिस तरह से जजों को दिए जाते हैं उस पर आपत्ति जताई थी। इस मामले ने उस वक्‍त काफी सुर्खियां बटोरी थीं। इसके अलावा उन्‍होंने ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को हिंदी में जारी कर वेबसाइट पर डालने का भी आदेश दिया था।

2. जस्टिस एसए बोबडे : वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने अपने नए फैसले में कहा है कि अगर तलाक की अर्जी लंबित है और दोनों पक्षों में केस को लेकर सहमति है तो दूसरी शादी मान्य होगी। हिंदू मेरिज एक्ट के सेक्शन 15 की व्याख्या करते हुए जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की बैंच ने कहा, तलाक के खिलाफ अपील की पेंडेंसी के दौरान दूसरी शादी पर रोक का प्रावधान तब लागू नहीं होता, जब पक्षकारों ने समझौते के आधार पर केस आगे न चलाने का फैसला कर लिया हो।

3. जस्टिस एनवी रमना : किसी आपराधिक मामले में अगर कोई एफआईआर रद्द की जा चुकी है तो उस मामले में फिर से दूसरी एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है, बशर्ते केस में कुछ नए तथ्य सामने आ गए हों। सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में यह व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एनवी रमना और एम शंतनागौदार की बेंच ने पटना हाईकोर्ट के एक फैसले को रद्द करते हुए कहा है कि एक ही केस में पहली शिकायत खारिज होने पर दोबारा एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है।

4. जस्टिस यूयू ललित : एससी एसटी एक्‍ट पर अहम फैसला देने वाली खंडपीठ में जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस ललित भी थे। उनका कहना था कि इसकी आड़ में फर्जी मुकदमें दर्ज करवाए जा रहे हैं। इसके अलावा तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। इतना ही नहीं तकनीकी शिक्षा को लेकर भी उनका फैसला काफी अहम रहा है। उन्‍होंने दो जजों की बेंच के तहत इसको गलत करार दिया था। जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित ने अपने फैसले में कहा कि यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजूकेशन ने इंजीनियरिंग के लिए डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम्स को अनुमति नहीं दी है। डिस्टेंस एजूकेशन काउंसिल द्वारा चलाए गए ऐसे सभी कोर्स गैरकानूनी हैं।

5. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़: संविधान पीठ के दूसरे न्‍यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ हैं जो देश के पूर्व मुख्‍य न्‍यायधीश वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं। उनके पिता वर्तमान समय तक देश के सबसे लंबी अवधि तक रहने वाले मुख्‍य न्‍यायधीश हैं। न्‍यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नाम के साथ कई बड़े और अहम फैसले हैं। वह इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्‍य न्‍यायधीश भी रह चुके हैं। उन्‍हें परंपरा और धर्म के मामले में अलग हटकर सोच रखने वालों में गिना जाता है। कई मामलों में उनके फैसले काफी अहम रहे हैं।

मार्च 2018 में उन्‍होंने चर्चित हादिया केस में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए हदिया और शाफीन जहां की शादी को सही करार दिया था। कोर्ट ने उनकी शादी को दोबारा बहाल किया था। इसी तरह से भीमा-कोरेगांव मामले में एक्टिविस्ट की गिरफ्तारी केस में तीन जजों की खंडपीठ में शामिल चंद्रचूड़ ने अन्‍य दो जजों से अलग राय दी। सितंबर 2018 में इस पर फैसला सामने आया था। इसके अलावा इच्छामृत्यु के मामले या फिर लिविंग विल मामले में बनी संविधान पीठ का वह भी हिस्‍सा थे। मार्च 2018 में दिए फैसले में उन्होंने अपने फैसले में कहा था कि लाइलाज बीमारी की गिरफ्त में आने के बाद किसी भी इंसान को अपनी मौत मांगने का अधिकार है। इस खंडपीठ ने लिविंग विल को मंजूरी देकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। फैसले में कोर्ट ने व्‍यवस्‍था दी कि ठीक न हो सकने वाली बीमारी की चपेट में आने के बाद पीड़ित अपनी वसीयत खुद लिख सकता है, जो डाक्टरों को लाइफ सपोर्ट हटाने की मंजूरी यानी इच्छा मृत्यु (यूथनेशिया) की इजाजत देता है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने वाली खंडपीठ के चंद्रचूड़ भी सदस्‍य थे।

Posted By: Arvind Dubey