नई दिल्ली . माला दीक्षित। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले में फैसले का वक्त आ गया है। देश के सबसे विवादित और चर्चित इस केस में अन्य पक्षों के अलावा रामलला विराजमान और जन्मस्थान की ओर से अलग से मुकदमा दाखिल किया गया है। दोनों को अलग-अलग देवता और न्यायिक व्यक्ति बताते हुए निकट मित्र के तौर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनंदन अग्रवाल की ओर से केस किया गया। निकट मित्र और मूर्ति यानी हिंदू देवता को न्यायिक व्यक्ति मामले को लेकर कानून में रोचक व्यवस्था है। जानिए इसी बारे में -

दोनों पक्षों ओर से किए जा रहे दावों के बीच देवता के बारे में कानूनी स्थिति पर विचार करना बहुत अहम हो गया है। कानून की नजर में मूर्ति यानी हिंदू देवता न्यायिक व्यक्ति माना जाता है और उसे वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जो किसी इन्सान को होते हैं। लेकिन कानून की नजर में देवता हमेशा नाबालिग होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों के बाद कानून का यह सिद्धांत तय किया है कि देवता नाबालिग माने जाएंगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस तरह कोई बच्चा अपने बारे में खुद फैसला नहीं कर सकता है, उसी तरह देवता भी खुद अपने हित नहीं देख सकते हैं। उनकी जगह कोई और उनके हित देखता है, जैसे - निकट मित्र।

नाबालिग को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता, पढ़िए दोनों पक्षों की दलील

कानून के अनुसार, किसी भी समझौते के तहत नाबालिग को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता है। इस मुकदमे में हिंदू पक्ष की ओर से यही दलील पेश की गई है कि देवता पर समय-सीमा का सिद्धांत लागू नहीं होगा और ना ही देवता के खिलाफ प्रतिकूल कब्जे का दावा किया जा सकता है। जब देवता को हटाया नहीं जा सकता तो फिर प्रतिकूल कब्जे का दावा कैसे किया जा सकता है।

हिंदू पक्ष की इस दलील के खिलाफ मुस्लिम पक्ष का कहना है कि देवता की संपत्ति पर भी समय-सीमा और प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत लागू होता है।

यहां फंसा है पेंच

हिंदू पक्ष ने जन्मस्थान को ही देवता और न्यायिक व्यक्ति बताया है। पेंच इस बात को लेकर फंसा है। हिंदू पक्ष के अनुसार, यहां बात देवता की संपत्ति की नहीं, बल्कि स्वयं देवता की हो रही है। जन्मस्थान स्वयं देवता है, देवता पर कब्जा या प्रतिकूल कब्जे का दावा कैसे हो सकता है। मुस्लिम पक्ष के वकीलों का कहना है कि हिंदू पक्ष की ओर से जानबूझकर स्थान को देवता और न्यायिक व्यक्ति बनाया गया ताकि बाकी सभी पक्षों का जमीन पर अधिकार खत्म हो जाए और समय-सीमा तथा प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत भी लागू न हो।

सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है

देवता और न्यायिक व्यक्ति के विषय पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के तीन में से दो जजों ने माना है कि जन्मस्थान देवता और न्यायिक व्यक्ति है। यही नहीं, तीनों जजों ने देवता की मूर्ति यानी रामलला को नाबालिग और न्यायिक व्यक्ति माना है, क्योंकि कानून स्पष्ट है। अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि वह जन्मस्थान को अलग से न्यायिक व्यक्ति और देवता मानता है या नहीं। अगर मानता है तो उसको कौन-कौन से अधिकार प्रा्प्त होंगे।

राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला भी बन सकती है नजीर

इस मामले में राजस्थान हाई कोर्ट का जगन्नाथ बनाम बोर्ड ऑफ रेवेन्यू का फैसला भी देखा जा सकता है। इसमें हाई कोर्ट ने कहा था कि केस से जुड़ी जमीन देवता की है, जो कि नाबालिग और न्यायिक व्यक्ति हैं। कानून के अनुसार, चाहे कितना भी वक्त क्यों न गुजर गया हो कोई भी व्यक्ति, देवता के खिलाफ उस जमीन पर किराएदारी का हक प्राप्त नहीं कर सकता।

Posted By: Arvind Dubey