नई दिल्ली। अयोध्या में राम जन्मस्थान पर मंदिर बनाने का रास्ता साफ करने वाले सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर के फैसले पर पुनर्विचार के लिए शुक्रवार को शीर्ष अदालत में छह नई याचिकाएं दाखिल की गईं। मालूम हो कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से दिए ऐतिहासिक फैसले में विवादित पूरी 2.77 एकड़ जमीन भगवान रामलला को तथा अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए प्रमुख जगह पर पांच एकड़ जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का आदेश दिया था।

पांच पुनर्विचार याचिकाएं मौलाना मुफ्ती हसबुल्लाह, मौलाना महफूजुर रहमान, मिशबाहुद्दीन, मोहम्मद उमर तथा हाजी महबूब द्वारा दाखिल की गई हैं, जिनका समर्थन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने किया है। इन पांच याचिकाओं को वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन और जफरयाब जिलानी ने अंतिम रूप दिया है। छठी याचिका मोहम्मद अयूब ने दायर की है।

एक याचिका की शुरुआत में यह स्पष्ट किया गया है कि इनका मकसद इस महान देश में शांति को बिगाड़ना नहीं है लेकिन शांति की यह भावना निश्चित तौर पर न्याय के अनुकूल होना चाहिए। इस मामले में मुस्लिमों ने हमेशा शांति बनाए रखी है लेकिन उनकी संपत्तियों को हिंसा और पक्षपाती रवैये से निशाना बनाया जाता रहा है।

पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल करने वाले पांचों याचियों ने अपने वकील एमआर शमशाद के जरिए जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि एआईएमपीएलबी ने 17 नवंबर को तय किया था कि वह इस मामले में पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल करने का समर्थन करेगा।

इसके पहले 2 दिसंबर को भी उत्तर प्रदेश जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष तथा अयोध्या मामले में मूल पक्षकार रहे ए. सिद्दिक के वारिस मौलाना सैयद अशद रशीदी ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश दिए जाने से ही इस मामले में 'पूर्ण न्याय" होगा। उन्होंने फैसले के 14 बिंदुओं पर पुनर्विचार की अर्जी लगाई है।

मौलाना मुफ्ती हसबुल्लाह ने अपनी पुनर्विचार याचिका में कहा है कि जमीन के मालिकाना हक के इस विवाद में उनके समुदाय के साथ 'घोर अन्याय" हुआ है और कोर्ट को इस पर फिर से विचार करना चाहिए।

इन बिंदुओं पर जताई हैं आपत्तियां

इसमें कहा गया है कि पूरी विवादित जमीन का मालिकाना अधिकार हिंदू पक्षकारों को इस आधार पर नहीं दिया जा सकता कि यह पूरी तरह उनके कब्जे थी, जबकि किसी भी अवसर पर यह हिंदुओं के पास नहीं था। यह भी एक स्वीकार्य तथ्य है कि दिसंबर, 1949 तक मुस्लिम इस स्थान पर आते थे और नमाज पढ़ते थे।

याचिका में कहा गया है कि नौ नवंबर के फैसले ने मस्जिद को नुकसान पहुंचाने और अंतत: उसे ढहाने सहित जैसे कृत्यों से कानून का उल्लंघन किया गया। इन गंभीर गैरकानूनी कृत्यों को माफ कर दिया गया। यही नहीं, कोर्ट द्वारा इस स्थान पर जबर्दस्ती गैरकानूनी तरीके से मूर्ति रखे जाने की अपनी व्यवस्था के बाद भी फैसले में तीन गुंबद और बरामदे पर मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति के अधिकार को स्वीकार करने को भी याचिका में गंभीर त्रुटि बताया गया है।

याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सुन्न्ी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ भूमि आवंटित करने का निर्देश देना भी गलत है, क्योंकि इस मामले में कभी भी इसकी मांग ही नहीं की गई।

यही नहीं, कोर्ट द्वारा इस स्थान पर जबर्दस्ती गैरकानूनी तरीके से मूर्ति रखे जाने की अपनी व्यवस्था के बाद भी फैसले में तीन गुंबद और बरामदे पर मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति के अधिकार को स्वीकार करने को भी याचिका में गंभीर त्रुटि बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सुन्‍नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ भूमि आवंटित करने का निर्देश देना भी गलत है, क्योंकि इस मामले में कभी भी इसकी मांग ही नहीं की गई।

हिंदू महासभा ने भी आपत्ति दर्ज कराई

अयोध्या केस में अब हिंदू महासभा ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई है। हिंदू महासभा का कहना है कि मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ जमीन देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही नहीं है। साथ ही 9 नवंबर के अपने फैसले में सर्वोच्च अदालत ने 1949 और 1992 को लेकर जो टिप्पणियां की हैं, उन्हें भी वापस लिया जाए। माना जा रहा है कि 9 दिसंबर से पहले हिंदू महासभा की ओर से भी रिव्यू पीटिशन दायर की जा सकती है। दूसरी तरफ पीस पार्टी के अध्‍यक्ष डॉ। मोहम्मद अयूब ने एक बयान में कहा है कि हमारी पार्टी ने अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा करने के लिए एक याचिका दायर की है।

Posted By: Arvind Dubey

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