नई दिल्ली, अश्विनी उपाध्याय। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने शनिवार को अयोध्या रामजन्मभूमि मामले पर फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 45 मिनट तक फैसला पढ़ा और कहा कि मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाया जाए और इसकी योजना 3 महीने में तैयार की जाए। कोर्ट ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने का आदेश दिया और कहा कि मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन आवंटित की जाए। कोर्ट ने साथ ही कहा कि इसके लिए केंद्र सरकार तीन महीने में योजना बनाए। सीजेआई गोगोई ने कहा कि हिंदू-मुस्लिम विवादित स्थान को जन्मस्थान मानते हैं, लेकिन आस्था से मालिकाना हक तय नहीं किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। हिंदू सदियों से पलक-पांवड़े बिछाकर जिस घड़ी का इंतजार कर रहे थे वह मौका आज आ गया है। सुप्रीम कोर्ट से मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। आमतौर पर अयोध्या को लोग मंदिर-मस्जिद विवाद के तौर पर ही जानते हैं लेकिन इसका इतिहास बहुत ही पुराना है और कदाचित कम ही लोग जानते होंगे। हमने इस मुद्दे की तह तक जाने के लिए मामले में शिया वक्फ बोर्ड के वकील, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय से बात की है। आज हम आपको इतिहास की उस यात्रा पर ले चलेंगे जहां राम केवल आराध्य नहीं हैं, केवल अनुष्ठान नहीं हैं बल्कि मर्यादा के प्रतीक भी हैं। वह अनकही कहानी जिसे शायद कम ही लोग जानते हैं।

क्या था विवाद की वजह

अयोध्या विवाद सामान्य मंदिर-मस्जिद का विवाद नहीं था। यह भगवान की जन्मभूमि को प्राप्त करने का संघर्ष था। यह जन्मस्थान स्वयं में एक देवता है और देवता का विभाजन नहीं हो सकता। जन्मस्थान पर विराजित रामलला विराजमान एक विधिक प्राणी हैं, शाश्वत नाबालिग हैं। भगवान की सम्पत्ति पर किसी दूसरे का स्वामित्व नहीं हो सकता है। जन्मभूमि अपरिवर्तनीय है, इसकी अदला-बदली नहीं की जा सकती, यह बेची नहीं जा सकती और न ही दान दी जा सकती है। विवाद 1460 वर्ग गज भूमि का है। भारत सरकार द्वारा अधिग्रहित 70 एकड़ भूमि इससे अलग है तथा वह सरकार के पास है और कोई मुकदमा लम्बित नहीं है।

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि रामलला विराजमान भगवान की जन्मभूमि, लीलाभूमि व क्रीडा भूमि है। हजारों वर्ष पूर्व स्कंद पुराण में इसी स्थान के महत्व का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि रामजन्म स्थान का दर्शन मोक्षदायक है। उन्होने बताया कि किसी भी समुदाय के आराध्य देवी-देवताओं के मन्दिर देश में अनेकों स्थानों पर बनाए जा सकते हैं, महापुरुषों की प्रतिमायें अनेकों स्थानों पर स्थापित की जा सकती है। परन्तु उनका प्राकट्य स्थल / जन्म स्थान एक ही होगा और वह कभी बदला नहीं जा सकता। जन्मभूमि अपरिवर्तनीय है। हिन्दुओं के लिए अयोध्या का उतना ही महत्व है जितना मुस्लिमों के लिए मक्का का है।

संघर्ष एवं आंदोलनों का इतिहास

अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि जन्मभूमि को प्राप्त करने का संघर्ष 1528 ई0 से (जिस दिन बाबर ने मन्दिर तोड़ने का आदेश दिया था) सतत जारी है। इस संघर्ष को सम्पूर्ण हिन्दू समाज लगातार लड़ रहा है.।अयोध्या के सन्तों व आसपास के राजा-महाराजाओं का इस संघर्ष में विशेष योगदान रहा है। 76 संघर्षों का वर्णन इतिहास के पन्नों में मिलता है. संघर्ष बताते हैं कि हिन्दुओं ने इस स्थान से अपना दावा कभी नहीं छोड़ा। इन संघर्षों से पता चलता है कि मुस्लिम आक्रमणकारी व उसके वंशजों का इस स्थान पर कब्जा कभी भी शान्तिपूर्ण, लगातार व निर्बाध नहीं रहा।

अंग्रेज जज ने मंदिर तोड़ मस्जिद बनाने को बताया था दुर्भाग्यपूर्ण

उपाध्याय ने बताया कि सन् 1885 में जन्मभूमि परिसर के बाहरी आंगन में स्थित रामचबूतरे पर छप्पर को पक्का करने के लिए एक प्रार्थना पत्र तत्कालीन अधिकारी को निर्मोही अखाड़ा की ओर से दिया गया था। इस विषय पर अन्तिम रूप से अंग्रेज न्यायाधीश कर्नल चेमियर ने निर्मोही अखाड़े को अनुमति तो नहीं दी परन्तु अपने निर्णय में यह स्वीकार किया कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मन्दिर को तोड़कर यहाँ पर मस्जिद बनाई गई। मार्च 1983 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर शहर में आयोजित हिन्दू सम्मेलन में स्वर्गीय दाऊदयाल खन्ना ने राम भक्तों का आह्वान किया कि अयोध्या, काशी और मथुरा के स्थलों को मुक्त कराओ और हिन्दुस्तान का गौरव वापस लाओ।

रामभक्तों के प्रयास से खुला मंदिर का ताला

अश्विनी उपाध्याय कहते हैं कि 7-8 अप्रैल 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में सन्तों का सम्मेलन हुआ (प्रथम धर्म संसद)। श्री राम जन्मभूमि को मुक्त कराने का संकल्प लिया गया. इस प्रकार सन्तों के आदेश से विश्व हिन्दू परिषद ने 77वें संघर्ष को प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम जन्मभूमि पर लगे ताले को खोलने के लिए जन-जागरण का निश्चय हआ। सीतामढ़ी में राम-जानकी रथ का पूजन हुआ. 7 अक्टूबर 1984 को अयोध्या में सरयू के तट पर राम जानकी रथ आया। हजारों राम भक्तों ने सरयू महारानी का जल हाथ में लेकर श्री राम जन्मभूमि को मुक्त कराने की प्रतीज्ञा ली। अक्टूबर 1985 से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में पुन 6 रथों के द्वारा जन-जागरण प्रारम्भ हुआ। परिणामस्वरुप श्रीराम जन्मभूमि पर वर्ष 1949 ई से लगा ताला अदालत के आदेश 01 फरवरी 1986 को खुल गया। रामलला के दर्शन-पूजन को रोकने के कई बार प्रयास हुए परंतु अदालत ने उसे स्वीकार नहीं किया।

अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता द्वारा कराया गया राम मन्दिर का शिलान्यास

उपाध्याय ने बताया कि मंदिर का ताला खुलने के बाद जागरण अभियानों का एक क्रम प्रारम्भ हो गया। शिलापूजन का कार्यक्रम देशभर के लगभग 3 लाख गांवों में आयोजित किया गया। देश विदेश से पूजित शिलाएं अयोध्या पहुंच गई। पूज्य साधु-संतों की उपस्थिति में अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता श्री कामेश्वर चौपाल द्वारा हिन्दू आकांक्षाओं के प्रति भव्य राम मन्दिर का शिलान्यास हुआ. यह कार्यक्रम राम भक्तों की शक्ति के साथ-साथ समरसता का एक अद्भुत उदाहरण था। राम ज्योति, राम चरण पादुका पूजन, विजय मंत्र जाप अभियान जैसे अनेक कार्यक्रमों से देश में अद्वितीय जागरण हुआ। 24 जून, 1990 को हरिद्वार में केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में निर्णय किया गया कि 30 अक्टूबर, 1990 (देवोत्थान एकादशी) को कारसेवा करने के लिए अयोध्या जाएंगे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अयोध्या को चारों ओर से सुरक्षा बलों के द्वारा घेर दिया और घोषणा करी कि ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

मुलायम सिंह ने चलवाईं कारसेवकों पर गोलियां

उपाध्याय ने बताया कि हिन्दू समाज ने इस चुनौती को स्वीकार किया और सब प्रकार के दमनचक्रों के बावजूद हजारों लोग अयोध्या पहुँच गए। कारसेवकों ने निर्धारित समय पर गुम्बदों के ऊपर भगवा पताका फहरा दी। वहाँ गोलियाँ चलीं व कारसेवकों के बलिदान हुए. 02 नवम्बर 1990 का गोली काण्ड सर्वविदित है। अन्ततः सरकार झुकी और सभी कारसेवकों को दर्शन करने की अनुमति मिली, तभी कारसेवक अपने घर गए। दस दिन का सत्याग्रह हुआ, हजारों लोग रोज आते थे. कारेसवकों की अस्थियों का देशभर में पूजन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

मुलायम का इस्तीफा, बाबरी ढाँचा ध्वस्त

उपाध्याय ने बताया कि 04 अप्रैल 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर ऐतिहासिक विराट जनसभा हुई। अनुमानतः 25 लाख रामभक्त इस सभा में आए. सभा समाप्त होते-होते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दे दिया। उत्तर प्रदेश में पुनः चुनाव हुए तथा कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। पुनः घोषणा हो गई कि 06 दिसम्बर, 1992 को कारसेवा करंगे श्री कल्याण सिंह जी ने घोषणा की कि गोली नहीं चलेगी। अयोध्या के चारों ओर सुरक्षा बल बैठा दिए गए. राम भक्तों के साथ हो रहे अत्याचारों के कारण समाज का गुस्सा फूट पड़ा और बाबरी ढाँचा ध्वस्त हो गया. 1984 से प्रारम्भ हुए श्री राम जन्मभूमि संघर्ष के इस चरण में करोड़ों रामभक्तों की सहभागिता हुई। राम भक्तों का संकल्प हर अभियान के साथ और मजबूत होता गया।

स्वतंत्र भारत में श्रीराम जन्मभूमि पर मुकदमों का इतिहास

अयोध्या विवाद में मुकदमों के इतिहास के सवाल पर उपाध्याय ने बताया कि 22-23 दिसम्बर, 1949 की मध्यरात्रि में राम जन्म स्थान पर रामलला का प्राकट्य हो गया। प्रशासन ने शान्ति व्यवस्था के नाम पर ढांचे के दरवाजों पर ताला लगवा दिया। समाज ने आपत्ति की तो न्यायालय ने प्रतिदिन प्रातः-सायं ताले खोलकर भगवान की पूजा आरती का आदेश दिया। आज भी उसी स्थान पर रामलला विराजमान है और निरंतर पूजा हो रही है।

जब मामले को लेकर अदालत में पहला वाद किया गया दायर

उपाध्याय ने बताया कि जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने अदालत में अपना वाद दायर करके माँग की कि मैं भगवान का भक्त हूं नित्य दर्शन के लिए आता हूँ अतः मेरे दर्शन-पूजन में कोई व्यक्ति अथवा प्रशासन किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाये। प्रशासन ने इस स्थान के प्रबंधन के लिए एक रिसीवर नियुक्त कर दिया।

निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड ने वाद दायर किया

वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने फैजाबाद की अदालत में अपना वाद दायर करते हुए मांग की थी कि सरकार द्वारा नियुक्त रिसीवर हटाया जाये और हमें प्रबन्धन सौंपा जाए। 18 दिसम्बर, 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड ने अपना मुकदमा दायर कर मांग की थी कि इस ढाँचे को मस्जिद घोषित किया जाये, और ढाँचे के अन्दर रखी पूजा सामग्री हटाई जाए।

भगवान की ओर से रामलला विराजमान एवं स्थान जन्मभूमि बना वादी

उपाध्याय ने बताया कि जुलाई, 1989 में स्वयं भगवान रामलला विराजमान एवं जन्मभूमि स्थान को वादी बनाते हुए मुकदमा दायर हुआ। भगवान ने स्वंय अपना पक्ष रखा. 1989 में उपर्युक्त चारों वाद निचली अदालत से उठाकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सामूहिक सुनवाई के लिए सौंप दिए गए और इन चारों मुकदमों की सुनवाई एक साथ होने लगी। जनता की भावनाओं को समझने में सरकार ने देरी की, परिणामस्वरूप समाज का आक्रोश 06 दिसम्बर, 1992 को फट पड़ा. परिणाम सब जानते हैं।

विवादित भूमि के चारो की जमीन अधिग्रहित, जिसमें एक एकड़ भी मुस्लिम की नहीं

शिया वक्फ बोर्ड के वकील ने आगे बताया कि ढाँचा गिरने के बाद तथाकथित विवादित भूमि और उसके चारों ओर फैली हिन्दू समाज की 67 एकड़ जमीन भारत सरकार ने 7 जनवरी 1993 को कानून बनाकर (अधिनियम 33/ 1003) अधिग्रहित कर ली थी. इस अधिग्रहित 67 एकड़ भूमि में एक इंच भूमि भी किसी मुस्लिम की नहीं है। उपर्युक्त अधिग्रहण के खिलाफ 1093 में इस्माइल फारुकी नामक एक मुल्जिम सर्वोच्च न्यायालय में गये और माँग की कि मस्जिद की जगह का अधिग्रहण नहीं हो सकता. इसी कालखण्ड में राष्ट्रपति महोदय ने संविधान की धारा 143 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रश्न का उत्तर देने का निवेदन किया. राष्ट्रपति महोदय का प्रश्न था कि “क्या विवादित स्थान पर वर्ष 1528 ईo से पहले कोई हिंदू उपासना स्थल था” ?

विवादित भूमि का अधिकरण रद्द, सभी मुकदमें पुन: प्रारंभ

अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका और राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में पाँच न्यायपीशों की संविधान पीठ बनी। लगभग 22 माह की सुनवाई के पश्चात संविधान पीठ ने राष्ट्रपति महोदय का प्रश्न बिना उत्तर दिए वापस कर दिया और लिखा कि 1528 ई0 पूर्व की इस स्थिति का उत्तर विज्ञान और पुरातत्व के आधार पर ही दिया जा सकता है। साथ ही साथ सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत के आधार पर विवादित भूमि का अधिग्रहण रद्द कर दिया और विवादित भूमि से सम्बंधित सभी मुकदमों को पुनः प्रारम्भ करने का आदेश दिया था। यह भी कहा कि भारत सरकार इस विवादित भूमि की यथास्थिति बनाये रखेगी, सुरक्षा करेगी.।शेष जमीन का अधिग्रहण सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया. इसी मुकदमे को इस्माइल फारुखी के नाम से जाना जाता है. जिसका निर्णय अक्टूबर 1994 में हुआ था.

विवादित भूमि का तीन भागों में बंटवारा

उपाध्याय ने बताया कि 1995 में उच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि से सम्बंधित सभी वादों की सुनवाई के लिए तीन न्यायाधीशों की पीठ बनी. पीठ ने 15 वर्षों तक ट्रायल कोर्ट के रूप में कार्य किया. सन् 2003 में 1528 ई. से पूर्व की स्थिति जानने के लिए उच्च न्यायालय ने इस स्थान पर रडार तरंगों से भूमि के अंदर की फोटोग्राफी कनाडा के विशेषज्ञों से कराई थी और फोटोग्राफी रिपोर्ट की सत्यता जानने के लिए भारत सरकार के पुरातत्व विभाग से उत्खनन कराया था. रडार फोटोग्राफी रिपोर्ट, पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन एवं उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ द्वारा 30 सितम्बर, 2010 को दिये गये निर्णय से स्पष्ट हो गया कि विवादित भूमि पर 1528 ई0 से पहले भी एक हिन्दू मंदिर था. उच्च न्यायालय ने निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वाद निरस्त करते हुए लिखा कि इन्हें कोई राहत नहीं दी जा सकती. इसके विपरीत रामलला विराजमान के वाद को स्वीकार किया परन्तु विवादित भूमि का तीनों पक्षों में समान बंटवारे का आदेश दे दिया जो न्याय संगत नहीं है. इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय में अपील लेकर जाना आवश्यक हो गया.

सभी अपील दिसम्बर 2010 में दायर हुई. जुलाई, 2017 तक तो अपील सुनने का नंबर ही नहीं आया. अगस्त, 2017 में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने केस देखा तब पता चला कि हिन्दी, संस्कृत, फारसी उर्दू व फ्रेंच भाषाओं के दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद होना आवश्यक है. उत्तर प्रदेश सरकार ने 4 महीने में लगभग 14,000 पृष्ठों का अंग्रेजी में अनुवाद करवा दिया. 29 अक्टूबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय में अपील की सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि हमारी प्राथमिकता में और बहुत सारे मुकदमें हैं. ऐसा कहकर जनवरी 2019 तक के लिए इस मुकदमे को टाल दिया. साथ ही साथ अदालत ने आदेश दिया कि मुकदमा पांच न्यायाधीशों की पीठ सुनेगी.

अदालती प्रक्रिया का वर्तमान संदर्भ

शिया वक्फ बोर्ड के वकील ने बताया कि फरवरी 2019 को अदालत ने इच्छा व्यक्त की कि सभी पक्ष आपसी वार्तालाप के आधार पर विवाद का समाधान खोजें. अपने आदेश के द्वारा उन्होंने तीन व्यक्तियों की मध्यस्थता समिति घोषित कर दी. मध्यस्थता समिति ने 13 मार्च, 2019 से प्रारम्भ करके 01 अगस्त, 2019 तक सात चक्रों में सभी पक्षों से अलग-अलग बातचीत को.समस्त वार्ता गोपनीय रखी गई. अन्ततः 01 अगस्त, 2019 को वार्तालाप अनिर्णित व असफल समाप्त कर दी गईं. 02 अगस्त को मध्यस्थता समिति का वार्तालाप समाप्ति का पत्र सवोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ. परिणामत: संविधान पीठ ने 6 अगस्त से अपीलों की नियमित सुनवाई का आदेश पारित कर दिया. यह भी आदेश दिया कि अपीलें सोमवार से शुक्रवार तक सप्ताह में 5 दिन तथा प्रतिदिन प्रात: काल 10.30 बजे से सायंकाल 4.00 बजे तक सुनी जाएंगी और आवश्यकतानुसार रविवार को भी सुन सकते हैं अथवा सायंकाल 4.00 बजे के बाद एक घंटा अतिरिक्त सुन सकते हैं. 6 अगस्त, 2019 से प्रारम्भ होकर 16 अक्टूबर तक कुल 40 दिन वकीलों की बहस सुनी गई. अन्त के 11 कार्यदिवस एक-एक घंटा अतिरिक्त सुना गया.

उपाध्याय ने आगे बताया कि सितम्बर, 2019 में बहस के दौरान अदालत के सम्मुख अनायास यह विषय लाया गया कि दोनों पक्ष वार्तालाप के द्वारा समाधान के लिए तैयार हो रहे हैं. अदालत ने आदेश दिया कि वार्तालाप के इच्छुक पक्ष मध्यस्थता समिति के सम्मुख प्रस्तुत हो सकते हैं परन्तु अदालत की कार्यवाही यथावत चलती रहेगी. रामलला विराजमान की ओर से तत्काल सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को लिखित रूपमें दे दिया गया कि हम किसी वार्तालाप के हिस्से नहीं है. कुछ दिन पश्चात् रामलला के वरिष्ठ अधिवक्ता ने पीठ के सम्मुख खड़े होकर यह बात मौखिक रूपसे रख दी. अक्टूबर मास में न्यायालय में इस विषय पर फिर हलचल की गई. 02 अक्टूबर को रामलला विराजमान की ओर से फिर से लिखित रूप में मुख्य न्यायाधीश को दिया गया. 10 अक्टूबर को पुन पत्र दिया गया कि हम किसी वार्तालाप के अंग नहीं हैं. 16 अक्टूबर सायकाल संविधान पीठ ने सुनवाई पूर्ण घोषित कर दी. साथ ही साथ लिखित आदेश हुआ कि वैकल्पिक राहत के लिए सभी पक्ष अपनी बात आगामी तीन दिन में लिखित रूप में दे.

वार्तालाप का इतिहास (श्री राम जन्मभूमि पर हिन्दू-मुस्लिम के मध्य)

हिन्दू-मुस्लिम के मध्य डायलॉग पर पूछे गए सवाल पर अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि देश के अनेक बुद्धिजीवियों का यह मत रहा है कि इस विषय का समाधान आपसी वार्तालाप अथवा न्यायिक प्रक्रिया द्वारा हो. अतः विश्व हिन्दू परिषद ने वार्तालाप के सभी माध्यमों द्वारा यह प्रयास किया कि भारत के मुस्लिम नेता हिन्दू समाज की भावनाओं व आस्थाओं को जानें उन्हे समझे व उनका आदर करें. अनुभव यह आया कि मुस्लिम नेतृत्व सदियों पुराने इस संघर्ष को समाप्त करके परस्पर विश्वास और सद्भाव का नया युग प्रारम्भ करने के लिए इच्छुक नहीं है.

जब एक हिन्दू संत ने मुस्लिम पक्ष के आगे झोली फैलाकर राम मंदिर की मांगी भीख

उपाध्याय का कहना है कि श्री राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में श्री बूटा सिंह जी एवं श्रीमती शीला दीक्षित मध्यस्थता करती थीं. दिल्ली में ही अनेक बार विश्व हिन्दू परिषद एवं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के पदाधिकारियों के साथ आमने-सामने बैठकर बातचीत हुई. एक बार पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज भी वार्तालाप में थे, दोपहर का समय था, शुक्रवार का दिन था नमाज का समय हो गया. मुस्लिम पक्ष के महानुभाव नमाज पढ़कर जब वापस लौटे तो पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज ने खड़े होकर अपना वस्त्र फैलाकर कहा, “नमाज के बाद जकात करनी चाहिए. मैं श्रीराम जन्मभूमि की भीख माँगता हूं”. सब चुप रहे. महाराज श्री बैठ गए.

मुस्लिम वार्ताकार के वचन का नहीं किया गया पालन

एक अन्य वार्ता के समय सैय्यद शहाबुद्दीन ने कहा था कि यदि सिद्ध हो जाए कि मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई तो हम स्वेच्छा से समर्पित कर देंगे. यह वाक्य भारत सरकार ने अपने श्वेतपत्र में अंकित किया है. 1994 में इस्माइल फारूखी की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में भी इस तथ्य का उल्लेख है. परन्तु इस वचन का भी पालन नहीं किया गया.

चन्द्रशेखर सरकार सरकार में शुरु हुई वार्ता

उपाध्याय ने बताया कि चन्द्रशेखर जी के काल में भारत सरकार की पहल पर द्विपक्षीय वार्ता प्रारम्भ हुई. तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्री सुबोधकांत सहाय, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री क्रमश: श्री मुलायम सिंह यादव, श्री शरद पवार व श्री भैरोंसिंह शेखावत भी इन बैठकों में उपस्थित रहते थे. 01 दिसम्बर, 1990 को अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्यों के साथ विश्व हिन्दू परिषद के प्रतिनिधियों ने वार्ता की. परिषद की ओर से श्री विष्णुहरि डालमिया, श्री बद्री प्रसाद तोषनीवाल, श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित, श्री मोरोपंत पिंगले, श्री कौशलकिशोर, श्री भानु प्रताप शुक्ल, श्री आचार्य गिरिराज किशोर व श्री सूर्य कृष्ण उपस्थित रहे. श्री मोरोपंत पिंगले ने सुझाव दिया था कि अगली बैठक में दोनों पक्षों की ओर से तीन-तीन चार-चार विशेषज्ञों को सम्मिलित किया जाए. वे ही अपने पक्ष के प्रमाणिक साक्ष्य प्रस्तुत करें. राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भैरों सिंह शेखावत ने सुझाव दिया था कि दोनों पक्षों के विशेषज्ञ इन प्रमाणों का परस्पर आदान-प्रदान करें और सत्यापन करें. इस पर जिलानी ने कहा कि पहले समिति के सदस्य आपस में साक्ष्य सत्यापन कर लें तब विशेषज्ञों का सहयोग लें. शेखावत जी ने सुझाव दिया कि इस विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए एक समय सीमा निर्धारित कर ली जाए. इस पर निर्णय हुआ कि दोनों पक्ष 22 दिसम्बर, 1990 तक अपने साक्ष्य गृह राज्यमंत्री को उपलब्ध कराएं. मंत्री महोदय पक्षियों की प्रतिलिपि सभी संबंधित व्यक्तियों को 25 दिसम्बर, 1990 तक उपलब्ध कराएं. इन साक्ष्यों के सत्यापन के पश्चात् दोनों पक्ष पुनः 10 जनवरी, 1991 को प्रातः 10.00 बजे मिलें. द्विपक्षीय वार्ता का एक औपचारिक दस्तावेज गृह राज्य मंत्री के कार्यालय में तैयार हुआ.

बाबरी मस्जिद कमेटी ने बदला पैंतरा

उपाध्याय का कहना है कि एक दूसरे के साक्ष्य का प्रत्युत्तर 06 जनवरी 1991 तक देना था. विश्व हिन्दू परिषद ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के दावों को निरस्त करते हुए अपना प्रत्युत्तर दिया. जबकि बाबरी कमेटी की ओर से अपने पक्ष को और अधिक प्रमाणित करने के लिए कुछ अतिरिक्त साक्ष्यों की फोटो प्रतियाँ दी गई. बाबरी कमेटी की ओर से प्रत्युत्तर के अभाव में सरकार के लिए यह कठिन हो गया कि सहमति और असहमति के मुद्दे कौन-कौन से हैं. 10 जनवरी 1991 को गुजरात भवन में बैठक हुई. अन्य प्रतिनिधियों के अतिरिक्त विश्व हिन्दू परिषद की ओर से विशेषज्ञ रूप में प्रो0 बी. आर. ग्रोवर, प्रो0 देवेन्द्र स्वरूप अग्रवाल व डॉ० एस. पी. गुप्ता सम्मिलित हुए और यह तय किया गया कि प्रस्तुत दस्तावेजों को ऐतिहासिक, पुरातात्विक, राजस्व व विधि शीर्षक के अन्तर्गत वर्गीकरण कर लिया जाए. यह भी तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने विशेषज्ञों के नाम देंगे जो सम्बंधित दस्तावेजों का अध्ययन करके 24-25 जनवरी 1991 को मिलेंगे और अपनी टिप्पणियाँ 05 फरवरी 1991 तक दे देंगे. तत्पश्चात् दोनों पक्ष इन विशेषणों की रिपोर्ट पर फिर से विचार करेंगे. बाबरी मस्जिद कमेटी ने अचानक पैतरा बदलना शुरू कर दिया. कमेटी ने अपने विशेषज्ञों के नाम नहीं दिए. वे अपने विशेषज्ञों की सूची में निरन्तर परिवर्तित करते रहे. 24 जनवरी 1991 को जो विशेषज्ञ आए उनमें चार तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कार्यकारिणी के पदाधिकारी थे व डॉ0 आर.स शर्मा, डॉ० डी.एन झा, डॉ0 सूरजभान व डॉ0 एम. अतहर अली विशेषज्ञ थे.

और सभी वार्ताएं असफल साबित हुईं

उपाध्याय ने बताया कि परिषद की ओर से न्यायमूर्ति गुमानमललोढ़ा, न्यायमूर्ति देवकीनन्दन अग्रवाल, न्यायमूर्ति धर्मवीर सहगल व वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी सरीखे कानूनविद् तथा इतिहासकार के रूप में डॉ0 हर्ष नारायण, श्री बी.आर. ग्रोवर, प्रो0 के. एस. लाल, प्रो0 बी. पी. सिन्हा, प्रो0 देवेन्द्रस्वरूप अग्रवाल तथा पुरातत्वविद् डॉ0 एस. पी. गुप्ता उपस्थित थे. बैठक प्रारम्भ होते ही बाबरी कमेटी के विशेषज्ञों ने कहा कि हम न तो कभी अयोध्या गए और न ही हमने साक्ष्यों का अध्ययन किया है. हमें कम से कम 6 सप्ताह का समय चाहिए. यह घटना 24 जनवरी 1991 की है. 25 जनवरी की बैठक में बाबरी कमेटी के विशेषज्ञ आए ही नहीं. जबकि परिषद के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ दो घण्टे तक उनकी प्रतीक्षा करते रहे. इसके बाद की बैठक में भी ऐसा ही हुआ. अन्ततः वार्तालाप बंद हो गया. नवम्बर 1992 में भी विश्व हिन्दू परिषद एवं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के बीच पत्राचार हुआ है. परिणाम कुछ नहीं निकला. मार्च 2019 में सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर तीन सदस्यों की समिति बनाई गई. सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति इब्राहिम कलीफुल्ला, मद्रास उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री श्रीराम पंचू और आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर जी के मध्य सात चक्रों में वार्ता हुई. 01 अगस्त 2019 को वार्ताकारों ने सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापन कर दिया और 02 अगस्त को वाता समाप्त होने का पत्र सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया. वार्ता का यह प्रयास भी असफल सिद्ध हुआ.

( ये लेखक के अपने विचार हैं)

Posted By: Yogendra Sharma