नई दिल्ली। अयोध्या में राम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्षकार की ओर सोमवार को पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी गई। इसमें कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश देकर ही इस मामले में 'पूर्ण न्याय" किया जा सकता है।

मालूम हो कि 9 नवंबर को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में ऐतिहासिक सर्वसम्मत फैसला देते हुए अयोध्या में विवादित पूरी 2.77 एकड़ जमीन भगवान रामलला को देने तथा मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही अन्यत्र किसी प्रमुख जगह पर पांच एकड़ जमीन सुन्न्ी वक्फ बोर्ड को देने को कहा था।

मामले में मुख्य मुस्लिम पक्षकार उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने तो उसी दिन ही एलान किया था कि वह इस फैसले को चुनौती नहीं देगा। लेकिन मामले में मूल पक्षकार रहे एम. सिद्दिक के कानूनी वारिस तथा उप्र जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अशद रशीदी ने फैसले के 14 बिंदुओं पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर कर दी है।

फैसले के अमल पर अंतरिम रोक की मांग

वकील एजाज मकबूल के जरिए दाखिल पुनर्विचार याचिका में शीर्ष अदालत के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई है, जिसमें कोर्ट ने मंदिर निर्माण के लिए केंद्र को तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया है।

मस्जिद के लिए जमीन देने के निर्देश पर भी सवाल

रशीदी ने कोर्ट के उस निर्देश पर भी सवाल उठाया है, जिसमें केंद्र तथा उप्र सरकार को अयोध्या में एक प्रमुख स्थान पर मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन देने को कहा गया है। उन्होंने कहा है कि मुस्लिम पक्षकारों ने तो कभी ऐसी मांग की ही नहीं थी।

सब कुछ माफ कर हिंदू पक्ष को दिया जमीन

याचिका में यह भी कहा गया है कि विवादित जगह पर मस्जिद ढहाने समेत हिंदू पक्षकारों द्वारा किए गए कई कृत्यों को अवैध मानते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने माफ कर जमीन उन्हें सौंप दिया। इस प्रकार से तो फैसले ने बाबरी मस्जिद को ढहाने और उस जगह पर भगवान राम का मंदिर निर्माण करने का एक 'परमादेश" ही दे दिया। याचिका के मुताबिक, कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि हिंदू पक्षकारों द्वारा 1934 में मस्जिद के गुंबद को नुकसान पहुंचाना, 1949 में मस्जिद को अपवित्र करना तथा 1992 में उसे ढहाना- अवैध कृत्य थे। लेकिन इसके बावजूद जमीन उन्हें ही सौंप दी गई।

पूरे फैसले की समीक्षा की मांग नहीं

हालांकि रशीदी ने कहा है कि वह पूरे फैसले की समीक्षा की मांग नहीं कर रहे। बल्कि उनकी याचिका हिंदुओं के पक्ष में जमीन का मालिकाना हक देने के आदेश में त्रुटियों तक सीमित है। गलतियों के दम पर हिंदू पक्षकारों को मालिकाना हक देकर उन्हें फायदा नहीं दिया जा सकता। 93 पेजी पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि कोर्ट ने पूर्ण न्याय के लिए इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 का गलत इस्तेमाल किया है। अवैध कृत्यों पर लगाम तो मस्जिद के पुनर्निर्माण का निर्देश देकर ही हो सकता है।

न्याय के बिना नहीं हो सकती शांति

रशीदी ने कहा है कि वह इस मामले की संवेदनशीलता से वाकिफ हैं और शांति तथा सौहार्द के लिए 'विवाद को समाप्त" करने की जरूरत है लेकिन न्याय के बिना शांति नहीं हो सकती है। कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधने की कोशिश में हिंदू पक्षकारों को उनके अवैध कृत्यों को माफ कर दिया और मुस्लिम पक्षकारों को पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन दे दी। जबकि मुस्लिम पक्षकारों की ओर कभी ऐसी मांग ही नहीं की गई। फैसले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों की अवहेलना हुई है और उस पक्ष का समर्थन किया गया, जिसने अवैध कृत्य किए।

इन बिंदुओं की अनदेखी का दावा

याचिका के मुताबिक, तथ्य तो यह है कि बाबरी मस्जिद एक वक्फ संपत्ति थी, जिसे स्वीकार नहीं किया गया और सबूतों को कथित तौर पर असमान रूप से लिया। फैसले में हिंदू पक्षकारों के मौखिक गवाहियों को मुस्लिम पक्षकारों के समकालीन दस्तावेजी सबूतों की तुलना में प्रधानता दी गई। कोर्ट ने यह नहीं मानकर गलती की कि विवादित ढांचा हमेशा से एक मस्जिद था, जो मुस्लिमों के कब्जे में रहा था।

साक्ष्य अधिनियम में अनुमान के सिद्धांत को भी नहीं माना गया कि 1528 से 1856 तक वहां नमाज अदा की जाती रही। कोर्ट को भगवान रामलला का मुकदमा भी नहीं स्वीकार करना चाहिए था, क्योंकि वह केवल अधैर्य पर आधारित था और यह किसी मुकदमे का वैध कारण नहीं हो सकता है। इसके अलावा यात्रियों के आलेखों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता और पुरातात्विक निष्कर्ष किसी जमीन के मालिकाना हक के विवाद का निपटारा करने का आधार नहीं हो सकता। लेकिन कोर्ट ने इन पर भरोसा कर गलती की है। हालांकि याचिका में कहा गया है कि कोर्ट के इस निष्कर्ष पर एतराज नहीं कि निर्मोही अखाड़ा की याचिका समय-सीमा के बाहर थी और जन्मस्थान एक न्यायिक व्यक्ति नहीं है।

Posted By: Yogendra Sharma