CAA Protest: Delhi फिर से झुलस उठी है। नागरिकता संशोधन कानून CAA के विरोध में राजधानी में इस सप्‍ताह फिर हिंसा भड़क उठी। अभी तक कई लोगों की मौतें हो चुकी हैं। कई लोगों के घर जल गए, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। बेकसूरों के साथ मारपीट और लूटपाट हुई। दंगाइयों के हिंसक प्रदर्शनों से सामान्‍य व्‍यक्ति सिहर उठा है। इस हिंसा को लेकर Social Media सोशल मीडिया पर देश भर के लोगों को गुस्‍सा भड़क उठा है। Facebook, WhatsApp और Twitter जैसे प्‍लेटफार्म पर यूजर्स टिप्‍पणी दे रहे हैं और एक बार फिर से बहस छिड़ गई है कि देश में ऐसा कब तक और क्‍यों चलता रहेगा। आइये देखें चुनिंदा कमेंट्स और टिप्‍पणियां।

आंखें नम कर देंगी ये तस्‍वीरें

इस छोटी सी 6 साल की बच्ची के लिए घर में क्या बचा है, Aaisha को अपनी नोटबुक घर के मलबे से पढ़ने के लिए मिली है।

#Delhigenocide #Delhigenocide

Âbhishek Kumar

पहले JNU फिर जमिया में दिल्ली पुलिस ने अब तक कितनी प्रभावी कार्यवाही की? पुलिस बैकफुट पर रही और वीडियो पर वीडियो वायरल होते रहे लेकिन अभी तक ये नही पता कि पुलिस ने कितनों को पकड़ा। शरजील जैसों के लगातर भाषण हो या CAA के नाम पर लगातार लोगों को पुलिस के सामने भड़काया गया लेकिन कितनो को नोटिस दिया कितनो पर केस किया? शायद 1 पर भी नही उल्टा शरजील जैसे लोग दिल्ली से भाग भी निकलते।

जब खुफिया इनपुट थे , ट्रम्प के आने से पहले सर्विलांस ज्यादा बेहतर था तब दिल्ली पुलिस से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गयी? लोगों की छतों पर रातों रात पत्थर, पेट्रोल बम जमा होते रहे लेकिन ड्रोन से निगरानी क्यो नही की गई? जबकि कुछ दिनों पहले ही जब दिल्ली की सड़कों पर आगजनी हुई थी तब भी यही पैटर्न फॉलो किया गया था। शाहिन बाग के बाद एकदम दूसरी सड़को पर जब लोग जाम करने पहुँच गए तब पुलिस ने पहले ही कड़ी कार्यवाही करके उन्हें क्यो नही हटाया?

जमिया से जुलूस में गोली चलाने के बाद फिर से वैसे ही घटना हुई इसमे अगर अपराधी चाहते तो बड़ी घटना कर सकते थे उस समय भी उनके सामने दिल्ली पुलिस की कार्यवाही मूक दर्शक बने रहने की थी। बाद में दोनो ने खुद पुलिस को सरेंडर सा कर दिया और जो अवैध कट्टे से फायर किया गया था पुलिस ने उसे कब्जे में लेकर इसे बेचने वाले को गिरफ्तार कर लिया।

लेकिन क्या पुलिस को सर्च ऑपरेशन चला कर लोगों के घरों में ऐसे हथियारों को नही खोजना चाहिए था? अगर ये कार्यवाही हो गयी होती तो शाहरुख जैसे लोग 8 राउंड फायरिंग न कर पाते और लगभग 600 राउंड फायरिंग 2-3 दिनों के दरम्यान न होती। उस पर अभी की खबर ये की शाहरुख की पहचान के बाद वह अपने परिवार के साथ भाग गया। पुलिस के एक जवान की जान चली गयी, IB के एक कर्मी को नृशंस तरीके से मार दिया गया और कई जवानों पर तेजाब तक फेंका गया।

इसके बाद भी पुलिस ने उन लोगों को चिह्नित करके कड़ी कार्यवाही क्यो नही की? क्यो नही cctv फुटेज के साथ दूसरे सबूतों के आधार पर उपद्रवियों को क्यो नही गिरफ्तार किया? उस पर तुर्रा ये की दिल्ली के कमिश्नर कही दिखाई ही नही दिए। बाद में दिल्ली के लिए स्पेशल कमिश्नर तक कि नियुक्ति करनी पड़ गयी। हालात को नियंत्रण करने के लिए खुद NSA को उतरना पड़ गया लेकिन यहाँ भी दिल्ली कमिश्नर सड़क से गायब रहे।

ताहिर हुसैन के घर से क्या कुछ हो रहा ये सबकों दिखाई दिया लेकिन फिर भी ताहिर हुसैन को पुलिस ने अब तक गिरफ्तार नही किया। अब बात अमित शाह की ये बात दीगर है कि दिल्ली की पुलिस केंद्र के अंडर में हैं लेकिन इसका मतलब ये नही होता कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर रोज अमित शाह को रिपोर्ट करते या अमित शाह रोज दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट लेते हैं।

कई UT है देश मे उनकी पुलिस भी केंद्र के अंडर में होती है तो उस हिसाब से अमित शाह का काम इतना भर रह गया कि वो रोज UT के हर पुलिस कमिश्नर से रिपोर्ट लेकर निर्देश देते रहे। क्या वाकई गृह मंत्री का काम ऐसे होता है या उसका काम इतना भर ही रह गया है? जबकि उनके जिम्मे कई काम रहते हैं जिस दिन इन घटनाओं की शुरुआत हुई उस समय अमित शाह अहमदाबाद में थे। देर रात आते ही उन्होंने मीटिंग लेना शुरू किया और शूट एट साइट का निर्देश भी दिया। यहाँ ये जरूर है कि ये कदम अगर पहले उठा लिए जाते तो आज स्थिति इतनी खराब न होती।

और अमित शाह इन सवालों से भी नही बच सकते। दिल्ली पुलिस हर बार इतनी ढीली कार्यवाही क्यो कर रही और दिल्ली पुलिस कमिश्नर की क्या जवाबदेही है ये भी शाह से पूछा जाना चाहिए। लेकिन जिस तरह दूसरे पक्ष की छोड़िए इधर वालों ने ही शाह के लिए चूड़ियां भिजवा दो, शाह लोगों को मारना चाहते है, और न जाने क्या क्या आरोप लगाए वो यही दिखाते है कि गुस्सा जायज है, सवाल पूछना भी जायज है लेकिन विरोधियों की भाषा बोलना कही से जायज नही है।

इतना सब होने के बाद अमित शाह को सबसे पहला काम दिल्ली पुलिस की पूरी कार्यशैली में बदलाव करने की होनी चाहिए। उनकी ट्रेनिंग से लेकर एक्शन लेने के लिए त्वरित निर्णय के साथ आधुनिक तकनीक के प्रयोग पर बल देना चाहिए। और सबसे पहले जो पुराने केस पड़े उन पर प्रभावी कार्यवाही करके कोर्ट में पैरवी के लिए अच्छे वकीलों को दिल्ली पुलिस की तरफ से खड़ा करना होगा।

Raj Narayan

कुछ साल पहले जो बात मैं नहीं समझ पाया था, आज जस्टिस मुरलीधर ने अपने काम से समझा दिया.

कई साल पहले मुझसे एक अधिकारी ने कहा था कि अगर अदालत न हो तो ये धूर्त और निकृष्ट नेता देश को बेच खाएं. तब मैं यह बात ठीक से नहीं समझ नहीं पाया था. यह बात आज बेहतर ढंग से समझ में आई.

तीन दिन से दिल्ली जल रही थी. हर जगह से सारे रिपोर्टर एक ही बात दोहरा रहे थे कि इलाके में दंगाइयों को खुली छूट है. पुलिस गायब है. सब नेता सन्नाटा मारकर अपने अपने दरबे में मस्त थे. मानवाधिकार की एक वकील ने हाईकोर्ट में आपात याचिका डाली. रात को 12 बजे अदालत बैठ गई और सुनवाई की. सुबह फिर सुनवाई की, दिन में फिर सुनवाई की. पुलिस को जम कर लताड़ लगाई. ढाई बजे की दूसरी सुनवाई तक पूरा सिस्टम सक्रिय हो गया था और मुझे कुछ सुकून मिल रहा था.

अचानक पुलिस बल सतर्क हो गया. हेल्पलाइन नंबर जारी हो गया. मदद को पुलिस पहुंचने लगी. केंद्र, राज्य, पक्ष, विपक्ष सब हरकत में आ गए. सोनिया गांधी के प्रेस कॉन्फ्रेंस करते ही सरकार के मंतरी कांग्रेस पर दोषारोपण के लिए ही सही, वे भी सक्रिय हो गए. डोभाल, केजरीवाल, कांग्रेसी सब मार्च करने लगे. हिंसा बंद हो गई.

जस्टिस मुरलीधर ने असल में वह काम किया, जो अदालत का काम है. उनके संज्ञान लेेते ही न सिर्फ हिंसा रुकी, बल्कि उन्होंने भड़काऊ भाषणों को खिलाफ एक्शन ना लेने पर पुलिस की जमकर मजम्मत की और बीजेपी के अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया.

जस्टिस मुरलीधर ने कमिश्नर से कहा कि जाओ रात भर भड़काऊ भाषणों के वीडियो देखो और कल आकर रिपोर्ट करो कि कितनी प्रगति हुई है. इस उदाहरण से आप समझिए कि इस देश की संस्थाएं कितनी मजबूत हैं और उन्हें बर्बाद करने का अभियान क्यों चल रहा है? इससे आप यह भी समझ सकते हैं कि कुछ बुद्धिजीवी बार बार संस्थाओं को लेकर चिंता क्यों व्यक्त करते हैं!

जस्टिस मुरलीधर और भारतीय न्यायपालिका को दिल से सलाम!

राजेश कुशवाहा

Arpit Dwivedi

मुझे एक बात अभी तक समझ में नहीं आयी कि जब शाहीन बाग और देश में चल रहे कई अन्य प्रदर्शनी स्थलों पर सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था और साथ ही सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई भी चल रही थी तो क्या जरूरत थी पूर्वी दिल्ली के कई स्थानों पर शाहीन बाग के प्रयोग को दोहराने की? और फिर अगर ये धरने प्रदर्शन तक सीमित रहता तो ठीक था, रोड ब्लॉक करने का आईडिया किसका था?

दक्षिणी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली की हिंदू लोकैलिटी में कितना फर्क है और शाहीन बाग का प्रयोग वहां दोहराना कितना खतरनाक हो सकता है ये दिल्ली में रहने वाला कोई साधारण आदमी भी बता देगा। फिर ये आत्मघाती प्रयोग करने की प्रेरणा किसने दी??

कहीं ऐसा तो नहीं शाहीन बाग में 70 दिन रोड ब्लॉक करने के बावजूद इच्छित परिणाम न आने के चलते लोगों को ऐसे करने को उकसाया गया हो? या ट्रम्प के दौरे के दौरान अंतराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरने के लिए?

कोई तो था जो चाहता था कि कुछ बवाल हो। कोई तो था जो चाहता था कि लहू गिरे। भाजपा और संघ की विचारधारा तो जगजाहिर है ही लेकिन एक बार ऐसे भी तो सोचिए..!

जितना आपको दिखाया जाता है बताया जाता है सच उतना ही नहीं होता। जाहिर षड्यंत्रकारी से छुपा हुआ षड्यंत्रकारी ज्यादा घातक होता है। लाशों के सौदागर दोनों ही तरफ हैं। और वो आपके हितैषी बनकर आपके बीच भी हो सकते हैं। उन्हें पहचानना बेहद मुश्किल हो जाता है जब कि आप किसी विचारधारा में अंधे हों तो।

जागिये! पहचानिए! ताकि इसकी पुनरावृत्ति न हो।

#Delhigenocide #Delhigenocide

देवेन्द्र सिकरवार

जो लोग चाहते हैं कि दिल्ली पुलिस उन्हें दंगाइयों की डैड बॉडी दिखाये तभी मानेंगे कि कार्यवाही हुई है उन्हें दो उपाय बताता हूँ।

1-सिविल सर्विस का एग्जाम देकर, प्रमोशन लेकर कमिश्नर, सेक्रेटरी बन जायें।

2- चुनाव लड़ें और गृहमंत्री बन जायें। और अगर खुद में न इतनी अक्ल पाते हो और न हिम्मत तो बस फेसबुक पर बैठकर सोहर गाते रहो। दिल्ली पुलिस और गृहमंत्री आपके निजी नौकर नहीं कि आपको रिपोर्ट करें कि हुजूर आज हमने इस इलाके में इतने जेहादी टपकाये आप चलकर उनके पाजामे खोलकर मुआयना कर लें।

ऐसे लोगों की वजह से भागलपुर मामले में पी ए सी के सिपाही आज तक सजा भुगत रहे हैं। 'गोपनीयता की शपथ' भी कोई चीज होती है और अब पुलिस गोपनीयता से काम करना जानती है क्योंकि यह कांग्रेस की पुलिस नहीं है। 😉

आशुतोष कुमार सिंह

IIT से पास एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर असम को भारत से काटने की बात करता है और उसके समर्थन में जेएनयू में खुल कर जुलूस निकलते हैं. संविधान की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता. 'शाहीन बाग़' में चलती सार्वजनिक सड़क पर नाजायज़ कब्ज़ा जमा कर संसद के सर पर महीनों से मूता जाता है और सुप्रीम कोर्ट के ग़ुलाम वहाँ से जूते खा कर आ जाते हैं. संविधान को हल्का सा बुख़ार भी नहीं होता. 'शाहीन बाग़' की सार्वजनिक सड़क कब्ज़ाने वाली अराजकता पूरे देश में कितने ही शहरों और ख़ुद दिल्ली में ही जाफ़राबाद जैसी कितनी ही और जगह फैला दी जाती है. संविधान और मज़बूत होता है. दिल्ली में पहले न्यू फ्रेंड्स कॉलनी, फिर सीलमपुर, फिर मौजपुर, भजनपुरा, करावल नगर, खजूरी ख़ास, चाँद बाग़ समेत राष्ट्रीय राजधानी के पूरे उत्तर-पूर्वी हिस्से को नफ़रत के ज़हर से भरे दंगों की आग के हवाले कर दिया जाता है. संविधान के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती. और कुछ महीनों पहले तक 'विशुद्ध सेक्युलर' रहा, अब 'सांप्रदायिक' हो कर नाकाम रहा एक हारा हुआ विधायक उस अराजक कब्ज़े से सार्वजनिक सड़क को छुड़वाने के लिए दिल्ली पुलिस को तीन दिन का अल्टीमेटम देता है, और संविधान/लोकतंत्र/भाईचारा सब नाली में बह जाता है. बहुत सही! वैसे इतना याद रहे कि उस कुछ महीनों पहले तक 'विशुद्ध सेक्युलर' रहे हारे हुए विधायक के दिए हुए अल्टीमेटम की आख़िरी तारीख़ आज मध्यरात्रि में ख़त्म हुई है. तो कम से कम संविधान/लोकतंत्र/भाईचारे के लिए अपनी प्रतिबद्धताएँ ज़ाहिर करने के लिए आज सुबह तक तो इंतज़ार कर लेते भाई? बेईमानी भी कहीं तो ईमानदारी से की जाए तो थोड़ी ख़ूबसूरत लगे, आख़िर स्मगलर-चोट्टे भी अपना बेईमानी का धंधा बेईमानी से नहीं करते.

Satish Aliya

दिल्ली दंगा त्रासदी नहीं, साजिश . -

दिल्ली में दंगा और 03 दर्जन से ज्यादा मौतों के लिए एक नहीं कई कथित जिम्मेदार दोषी हैं। इसका सीधा संबंध देश में आए शरणार्थियों को नागरिकता देने के कानून में संशोधन को लेकर अपना एजेंडा और सियासत चलाने की सियासत, बाद में इसे एनआरसी के साथ न जोड़ने की बात कहने वाली लेकिन संसद में खुला ऐलान कि एनआरसी होके रहेगा, करने वाले और दिल्ली चुनाव के मद्देनजर इस मुद्दे को गरमाने और गरियाने वालों से लेकर खुद को कथित सेक्युलर और राष्ट्रवादी बताने वाले सोशल मीडिया की कंदरा में सुरक्षित बैठकर माहौल खराब करने वाले कथित बुद्धिजीवी तक सब शरीके जुर्म हैं। संसद में नागरिकता संशोधन कानून पर बहस के दौरान मूक दर्शक बने रहे सियासी नेता जो बाहर निकलकर सड़क पर निकलकर विरोध करने के आव्हान करने लगे, वे भी उतने ही गुनहगार हैं, जितने इस खूनी साजिश को चार महीने से पकने देते रहने वाले खुफिया तंत्र और दिल्ली की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय।

अपनी डूबती सियासत को देश के धु्वीकरण के सहारे ठिए पर लाने और इसी धु्ुवीकरण से अपनी ताकत बनाए रखने के सियासी इंतजाम करने में जुटे लोग भी देश को दुनिया का सिरमौर बनाने के सपने दिखाने के बावजूद इसे 1947 के हालात में ले जाने वाले बयान देने में आगे रहे। दिल्ली पुलिस की नाकामी तो जगजाहिर है 1984 में इस शहर ने जो कत्लेआम देखा था, वैसा कत्लेआम उससे पहले 1947 में और उससे पहले औरंगजेब और नादिर शाह के वक्त ही देखा था। 1984 के हालात और अब के हालात में फर्क इतना है कि तब कि सियासत आतंकी हिंसा में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या का बदला निर्दोष सिखों से लिए जाने को गुनाह नहीं मान रही थी, और देश के बाकी हिस्सों में एक हत्या की सहानुभूति से प्रचंड बहुमत पाकर एक दूसरे अल्पसंख्यक वर्ग के तुष्टिकरण मेें लग गई थी।

अबकी सत्ता से जुड़े लोग भड़काऊ भाषण देकर आग में घी डालते रहे, अलबत्ता सत्ता ने इसकी तरफदारी सीधे तौर पर नहीं की। अदालत को भी कहना ही पड़ा कि दिल्ली में 1984 जैसा नहीं बनने देंगे। दूसरी तरफ 1984 होने देने वाली सियासी जमात के सत्ता विहीनता से छटपटाए लोग सब कुछ धू धू जलने और दर्जनों हत्याएं होने के बाद सड़क पर आए लेकिन उसमें भी सियासी बयानबाजी कर सरकार को घेरने का काम शुरू कर दिया गया। सत्ताधारी दल दिल्ली को जलने देने और हालात पहले ही नहीं भांप लेने या रोकने की नाकामयाबी को मानने के बजाए 1984 याद दिलाने की मुद्रा में आ गया।

लेकिन जिनके घर जल गए, कारोबार जल गए, घर के चश्मो चिराग शवों में बदल गए, उनका क्या? किसी भी ऐसे देश में जो अपने आप को पांच ट्रिलियन अर्थशक्ति बनाने और विश्वगुरू होने की कसमें खाता हो जो शांति के प्रतीक और अहिंसा के विश्व प्रतीक महात्मा गांधी के 150 वें जन्म वर्ष को धूमधाम से मना रहा हो, वहां की राजधानी में ऐसी हिंसा हो जाने देना क्या दर्शाता है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे और ठीक उसी दिन जिस दिन वे दिल्ली में थे, यह दंगा साजिश था तो फिर सरकार क्या फेल नहीं हो गई? दुनिया के सामने अपनी शूरवीरता दिखाना और घर में आए मेहमान के सामने ही खूनी होली हो जाना किसकी असफलता है?

असल मुजरिम सामने लाए सरकार संसद से पारित और राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद लागूु हो चुके नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भ्रम फैलाने से लेकर दंगे करने तक की साजिश में मुब्तिला लोगों और जमातों को सरकार बेनकाब करे न, उसे किसने रोका है। यह जरूरी है वर्ना हालात दिल्ली जैसे देश के बाकी शहरों में नहीं हो सकते इसकी क्या गारंटी है? इसलिए जरूरी है कि सरकार पक्की और यकीन करने लायक जांच अतिशीघ्र पूरी कर जनता के सामने हकीकत पेश करे। सत्ताधारी दल जिन जिन पर आरोप लगा रहा है, उन सबकी भूमिका और उन पर आरोपों को पुष्ट किया जाना जरूरी है।

सत्ताधारी दल भाजपा के लोग बदनाम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लेकर हाल ही में दिल्ली में फिर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी से जुड़े कथित नेताओं के नाम पर ले रही है। पीड़ितों को त्वरित मदद और न्याय मिले दिल्ली में 1984 के सिख नरसंहार पीड़ित 36 साल बाद भी अब तक न्याय के लिए भटक रहे हैं। उनके दोषी न केवल सांसद और मंत्री बनते रहे बल्कि सियासी रूप से सरसब्ज बने रहे। ताजा दंगों में भी सियासी बयानबाजी से लेकर साजिश तक के आरोप कई नेताओं पर लगे हैं। इसलिए पीड़ितों को त्वरित मदद और जल्द न्याय मिलने के साथ ही इसके साजिश कर्ताओं को भी सजा जल्द मिले और उन्हें राजनीतिक लाभ के हालात नहीं बनने दिए जाएं, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

Posted By: Navodit Saktawat