एटा। लाल हो चुकी आंखें फिर भी आंसू, चेहरों पर मायूसी, सूखे होठों पर पड़ी पपड़ी, पसीने से लथपथ। देखने से ही लगता है कि कई रात से ये ठीक तरह सोए नहीं हैं। न ही भर पेट कुछ खाया है। बातचीत में चेहरों पर पश्चाताप के भाव। वे ऐसे दर्द में डूबी हैं, जिसका इलाज हाल-फिलहाल होते उन्हें नहीं दिख रहा। यह तस्वीर उन महिलाओं और बच्चों की है, जिन्हें बुधवार शाम एटा जेल लाया गया।

गोरखपुर के दो मासूम पवन और बंटी के मां-बाप ऑपरेशन जवाहर बाग के दौरान बिछड़ गए थे। दोनों बच्चे मां की याद में जब रोते हैं, तो उन्हें अन्य बंदी महिलाएं संभालने की कोशिश करती हैं। इन बच्चों का कोई गुनाह न होते हुए भी जेल में समय काटना पड़ रहा है।

जिस बच्चे को दिन में दो-तीन बार दूध और भोजन चाहिए, उसे पानी भी नसीब नहीं हो रहा। अगर यकीन न हो तो बंदी महिलाओं से पूछिए कि सुबह नौ बजे से उन्हें एक जगह एकत्रित कर लिया गया, जहां पानी तक की सुविधा नहीं थी। छोटे-छोटे बच्चों ने कुछ भी नहीं खाया।

बंदियों की तरह कतार में बच्चे

जेल तो जेल है, बंदियों के लिए एक सा कानून है। यहां बच्चों पर रहम करने वाला कोई नहीं, क्योंकि अफसरों के पास बहाना है कि वे जेल मैनुअल में बंधे हुए हैं। बच्चों की गिनती भी बड़े बंदियों की तरह उन्हें कतारबद्ध कर की जा रही है। इस वजह से कुछ नहीं कर सकते। हां, इतना जरूर है कि निजी तौर पर कुछ पुलिसकर्मियों ने भूखे, प्यासे बच्चों पर तरस खाया और उन्हें बिस्कुट, नमकीन के पैकेट लाकर दिए।

मध्यप्रदेश के सागर जिले की रहने वाली सुनीता गिरधर ने बताया कि उसके छह माह के बच्चे को पांच दिन से दूध नहीं मिला। मां उसका पेट सिर्फ अपने दूध से ही भर रही है, लेकिन तीन-चार साल के वे बच्चे क्या करें, जो मां का दूध नहीं पी सकते। बच्चा जेल में बच्चों के रोने की आवाज सन्नाटा तोड़ देती है। बच्चों को रोता देख महिलाएं भी फूट-फूटकर रोने लगती हैं। न तो कोई इन्हें समझाने वाला है और न कोई संभालने वाला।

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