कोरोना महामारी के कारण देश की आर्थिक व्यवस्था बिगड़ गई है। इस जानलेवा संक्रमण के कारण बेहद नाजुक स्थिति बनी हुई है। मौतों का आंकड़ा थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने एक अध्ययन किया है। जिसमें बेहद ही चिंताजनक बातें सामने आई है। कोविड की पहली लहर और लॉकडाउन के कारण पिछले साल 23 करोड़ भारतीय गरीब हो गए। ग्रामीण अंचल से ज्यादा गरीबी का प्रभाव शहर में देखा गया है।

विश्वविद्यालय के अध्ययन में सामने आया कि 23 करोड़ लोग राष्ट्रीय न्यूनतम श्रमिक सीमा से भी नीचे आ गए हैं। ये आंकड़े अनूप सत्पथी कमेटी की 374 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी को आधार मानकर सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस का असर हर वर्ग पर पड़ा है, लेकिन सबसे अधिक कहर गरीबों पर टूटा है। पिछले वर्ष अप्रैल और मई में 20 फीसद परिवारों की आमदनी पूरी तरह समाप्त हो गई है। वहीं धनी लोगों की आमदनी में पहले की तुलना में एक बड़े हिस्से का नुकसान हुआ है। पिछले साल मार्च से लेकर अक्टूबर तक करीब 8 माह में हर परिवार को दो माह की आमदनी नहीं मिली। डेढ़ करोड़ से ज्यादा मजदूरों को पिछले साल अंत तक कोई काम नहीं मिला। इस दौरान 47 फीसद महिलाओं को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी है।

15 करोड़ से ज्यादा भुखमरी के कगार पर

वहीं दुनिया में 15 करोड़ से ज्यादो लोगों को दो जून से खाना भी नसीब नहीं हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र की 55 देशों पर 2020 में तैयार की गई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार 2019 के अपेक्षा 2020 में दो करोड़ नए लोग भुखमरी में शामिल हुए हैं। इनमें दो तिहाई लोगों की संख्या 10 देशों में हैं। इनमें कांगो, यमन, अफगानिस्तान, सीरिया, सूडान, इथोपिया, नाइजीरिया, सूडान, जिम्बाब्वे और हैती है।

Posted By: Navodit Saktawat

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