Delhi Education Board: मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने आज (शनिवार) राज्य का शिक्षा बोर्ड का ऐलान किया। इसको लेकर कैबिनेट की बैठक में मंजूरी भी दी गई है। ऐसे में अब दिल्ली के कुछ स्कूलों में नए शिक्षा बोर्ड के तहत पढ़ाई होगी। केजरीवाल ने कहा कि पूरी शिक्षा तंत्र रटने पर जोर देता है, जिसे बदलकर समझने पर जोर देना होगा। उन्होंने कहा कि राजधानी के सरकारी स्कूलों में परिणाम 98 प्रतिशत आने लगे हैं। सरकारी स्कूलों के बच्चों के रिजल्ट प्राइवेट स्कूल से बेहतर आ रहे हैं।

सीएम केजरीवाल आगे कहा कि अभिभावक अब दिल्ली के सरकारी स्कूलों को सुरक्षित मानते हैं। ऐसे में समय आ गया है यह तय किया जाए कि स्कूल में क्या पढ़ाया जा रहा है और क्यों पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा, अब हमें ऐसे बच्चों को तैयार करने की जरूरत है जो देशभक्त हो और हर क्षेत्री की जिम्मेदारी लेने में सक्षम हो। हालांकि सरकार के शिक्षा बोर्ड के फैसले पर बहस छिड़ गई है। एजुकेशन एक्टिविस्ट वकील अशोक अग्रवाल का कहना है कि सीबीएसई बोर्ड से एफिलिएटेड सरकारी स्कूलों के लिए अलग से बोर्ड बनाना सही नहीं है। सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल पूरे देश में और अन्य देशों में भी है। ऐसे में इंटरनेशनल बोर्ड को हटाकर राज्य बोर्ड में डालना छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा।

उन्होंने कहा कि शिक्षा मंत्री ने कहा है कि सबसे पहले 40 स्कूलों को ही बोर्ड से मान्यता दी जाएगी। इसमें सरकारी औप निजिी स्कूल शामिल होंगे। इसके बाद दिल्ली बोर्ड से मान्यता लेना स्कूलों की इच्छा पर है। ऐसे में यह बात समझ से बाहर है। अग्रवाल ने कहा, 'दिल्ली सरकार बोर्ड बनाती है तो सभी सरकारी स्कूल उस बोर्ड के अंतर्गत आ जाएंगे। वहीं प्राइवेट स्कूल सीबीएसई बोर्ड को छोड़कर दिल्ली बोर्ड में आएगा ये मुश्किल है।' उन्होंने आगे कहा कि आज भी अन्य राज्यों के बच्चे दिल्ली के स्कूलों में पढ़ना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें उनके प्रदेश बोर्ड के बजाय सीबीएसई बोर्ड से पढ़ना है। वहीं राष्ट्रीय शिक्षा नीति सदस्य राम शंकर कुरील ने कहा कि सीबीएसई एक बड़ा प्लेटफॉर्म है। उसे छोड़कर राज्य के बोर्ड और छोटे प्लेटफॉर्म पर जाना कितना सही है। इस बारें में कुछ कह नहीं सकते। अरविंद सरकार को इस मामले में सोचना चाहिए।

Posted By: Sandeep Chourey

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