मुकेश कुमार सिन्हा, राउरकेला (ओडिशा)

'धन्यवाद डॉ. मुकुट मिंज, मुझे गर्व है कि भारत के पास किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी में आप जैसे क्षमतावान सर्जन हैं।" विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सफल किडनी प्रत्यारोपण के बाद जब 19 दिसंबर को यह ट्वीट किया था तब से डा. मिंज समाचार पत्रों की सुर्खियां बन गए।

डा. मिंज की उपलब्धियां वास्तव में शानदार रही हैं। वे अब तक 3300 सफल किडनी प्रत्यारोपण कर चुके हैं। फोर्टिज हॉस्पिटल मोहाली के निदेशक डॉ. मुकुट मिज की यह कामयाबी संघर्ष के उस रास्ते से गुजरी है जिस पर चलते हुए कई लोग आधे रास्ते में ही हार मान लेते हैं।

डा. मुकुट मिज ने हर दिन खुद को तराशा व मौजूदा मुकाम हासिल किया। ओडिशा के आदिवासी बहुल सुंदरगढ़ जिले में कलुंगा से सटे गोईभंगा गांव में उनका जन्म हुआ था। गांव के पास स्थित कलुंगा प्राथमिक स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा हासिल की। आगे की पढ़ाई के लिए राउरकेला के उदितनगर हाई स्कूल में नामांकन कराया।

उन्हें घर से 12 किमी दूर उदितनगर स्कूल पैदल ही जाना होता था। यानी 24 किमी रोजाना आना-जाना। पिता मीका मिज एसडीजेएम कोर्ट में पेशकार थे, जिनका मासिक वेतन रिटायरमेंट तक महज 280 रुपये रहा, परंतु पिता ने तय कर रखा था कि वह अपनी पांचों संतानों, जिनमें चार बेटे व एक बेटी थी, को पढाएंगे।

डॉ. मुकुट के छोटे भाई सुनील के अनुसार पिता अकसर कहते थे, उनका कोई बेटा क्लर्क नहीं बनेगा। दसवीं पास मीका मिज के साथ उनकी पत्नी प्रेमिका मिज जो महज तीसरी पास थीं, वह भी यही सोचती थीं कि भले फांकाकशी करनी पड़े लेकिन बच्चों की पढ़ाई हर हाल में होगी। बेहद सख्त अनुशासन में मीका व प्रेमिका मिज ने अपने बेटों व बेटी की परिवरिश की।

सुनील मिंज के अनुसार 1970 में पिता के रिटायरमेंट के बाद परिवार आर्थिक तंगहाली से गुजर रहा था। हालात ऐसे हो गए थे कि 1973 में पिता को लैंपस से 300 रुपये कर्ज लेकर बच्चों की फी चुकानी पड़ी। इस कर्ज को उन्होंने धान बेचकर चुकाया। कर्ज की वसूली के लिए लैंपस से लोग घर तक आ गए थे। मीका व प्रेमिका मिंज दुनिया को अलविदा कह चुके हैं।

दो बेटों को बनाया डॉक्टर

अपने संघर्ष और जज्बे के बूते मीका व प्रेमिका मिज ने अपने बड़े बेटे प्रीतममासी मिज व मंझले बेटे मुकुट माझी को डॉक्टर बनाया। डॉ. प्रीतममासी जानेमाने अस्थि रोग विशेषज्ञ हैं। आस्ट्रेलिया में अपनी सेवा देने के बाद वे हाल में भारत लौट आए हैं। फिलहाल झारखंड के सिमडेगा के एक अस्पताल में सेवा दे रहे हैं।

डॉक्टर बनने के बाद कैथोलिक चर्च से जुड़े

डा. मुकुट के साथ पढ़े एचएन सिहदेव बताते हैं कि मुकुट शुरू से ही अनुशासित विद्यार्थी रहे। वे अपनी कक्षा में हमेशा अव्वल आते थे। 1967 में मैट्रिक करने के बाद वे इंटर करने सुंदरगढ़ चले गए। इसके बाद 1970 में उनका नामांकन बुर्ला मेडिकल कॉलेज, सुंदरगढ़ में हो गया और 1976 में एमबीबीएस की डिग्री ली। डॉक्टर बनने के बाद वे वापस गांव लौटे तथा कलुंगा स्थित कैथोलिक चर्च मिशन से जुड़कर एक साल तक सेवा दी।

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