संदीप त्रिपाठी, कोलकाता। पश्चिम बंगाल के रेडलाइट एरिये की अंधेरी गलियों में एक महिला का अटल इरादा व समर्पण शिक्षा का उजियारा फैला रहा है। न्यू लाइट संगठन के माध्यम से चलाई जा रही "आंचल" परियोजना में दौ सौ से ज्यादा यौनकर्मियों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। तिरस्कार की नजर से देखी जाने वाली इन महिलाओं व उनके बच्चों को उर्मी बसु समाज में सम्मान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। कालीघाट की इन गलियों में स्थित उर्मी दीदी की पाठशाला में किताबी शिक्षा के साथ रजाई व कंबल बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

उर्मी बताती हैं कि किसी भी काम का बीड़ा उठाना आसान है, लेकिन उसे आगे बढ़ाना कठिन है। मैंने अपने बचत के रुपये से 2000 में "न्यू लाइट" की स्थापना की। आज संगठन में उनके साथ करीब 20 लोग हैं, जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं। कहा, इस राह पर कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन हिम्मत से बड़ी संख्या में महिला तस्करी को रोकने में सफलता पाई। इसके अलावा महिलाओं पर होने वाली हिंसा की रोकथाम के लिए उनको कानूनी सहायता भी मुहैया कराई जाती है। संगठन के माध्यम से कई महिलाओं को नौकरी मिली और बदनाम गलियों से निकलकर अपनी पहचान बनाई।

कोलकाता के बाटानगर में चिकित्सक की बेटी उर्मी बताती हैं कि यौनकर्मियों के बच्चों को बेहतर जीवन उपलब्ध कराना ही उनका लक्ष्य है। आज उनके संगठन के माध्यम से 200 से अधिक यौनकर्मियों के बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण प्राप्त कर रहे हैं। पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार निकोलस क्रिस्टाफ ने अपनी किताब "हाफ द स्काई" में विशेष रूप से उर्मी के कार्यों का उल्लेख किया है। उर्मी की उपलब्धियों पर लघु फिल्में भी बनी हैं।

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