शत्रुघ्न शर्मा, अहमदाबाद। सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित एक 23 वर्षीय युवती की माता - पिता ने पुत्री को इच्छामृत्यु देने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका कहना है कि जन्म से ही असाध्य रोग से पीडित वैदेही केवल श्वांस ले सकती है और आंख से निरीक्षण कर सकती है। वह बातों को समझती जरूर है लेकिन प्रतिक्रिया देने में अक्षम है। अदालत ने सरकार व मेडिकल टीम से इस मामले में जवाब मांगा है।

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 2011 में इच्छामौत पर ऐतिहासिक फैसला देते हुए शायरी वाले अंदाज में कहा था कि मरते हैं आरजू में मरने की - मौत आती है पर नहीं आती। मुंबई किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज की पूर्व नर्स अरुणा शानबाग के लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की मंजूरी देते हुए इच्छाम्रत्यू को पहली बार न्यायिक रूपसे स्वीकार किया था।

अहमदाबाद के सोला में रहने वाले देवेंद्र राजगोर ने गुजरात हाईकोर्ट में दायर एक याचिका में बताया है कि 30 मई 1995 को जन्म लेने के छह माह बाद ही उसके असाध्य रोग से पीडित होने की पुष्टी हुई। बीते 23 साल से वह इस गंभीर रोग को सहन कर रही है। वैदेही पूरी तरह असहाय है, वह बीते इन वर्षों में केवल श्वांस ले पाती है और आंखों से देख पाती है। देवेंद्र बताते हैं कि वैदेही समझ सकती है पर किसी तरह की प्रतिक्रिया देने में भी समर्थ नहीं है।

पुत्री की इस असहाय हालत को देखकर माता - पिता ने अब उसके लिए इच्छामृत्यु की मांग की है। न्यायाधीश ए वाई कोगजे ने गुजरात सरकार व अहमदाबाद के सबसे बडे सिविल अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से इस संबंध में जवाब मांगा है। हाईकोर्ट में इस मामले पर 3 अप्रेल को सुनवाई होगी। गौरतलब है कि वैदेही के पिता के मस्तिष्क में ट्यूमर है जबकि माता भी मधुमेह से पीडित है।

गौरतलब है कि 2011 में अदालत ने अरुणा शानबाग का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने व द्रव पदार्थ के रूप में दिए जा रहे पोषण को बंद करने को न्यायिक मंजूरी दे दी थी जिसके बाद 2015 में उसकी मौत हो गई थी। अहमदाबाद के इस दंपत्ती ने पुत्री को इस पीडादायक जिंदगी से मुक्ति दिलाने के लिए यह मांग की है। उनके वकील अन्वेश व्यास ने बताया कि अदालत से वैदेही के मेडिकल एक्जामिन के लिए एक मेडिकल टीम गठित करने की मांग की गई है ताकि इनकी इच्छा मौत पर फैसला लिया जा सके।