नई दिल्‍ली। सऊदी अरब में शिया मौलवी शेख निम्र अल निम्र को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मुस्लिम दुनिया में तनाव और बढ़ा सकता है। ईरान में शिया धर्मतन्त्र के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनी ने रविवार को कहा था कि सुन्नी राजशाही द्वारा शासित सऊदी अरब को मुखर मौलवी की हत्या के लिए 'दिव्य प्रतिशोध' का सामना करना होगा।

गौरतलब है कि सऊदी अरब में शिया मौलवी सहित 47 लोगों को हाल ही में सजा-ए-मौत दी गई है। अल-निम्र ने सऊदी अरब और आस-पास के देशों में शियाओं के लिए अधिक से अधिक राजनीतिक अधिकारों के लिए वकालत की थी। इसके बाद सऊदी अरब ने सरकार ने निम्र के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था। ये हैं शिया और सुन्‍नी इस्‍लाम के बारे में बुनियादी अंतर...

क्‍यों हुए अलग

पैगम्‍बर मुहम्‍मद की 632 ईस्‍वी में मौत के बाद फूट पैदा हुई। मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करने के लिए एक उत्तराधिकारी की नियुक्ति के बिना वह मर गए। इसके बाद विवाद पैदा हुआ कि नए और तेजी से बढ़ते धर्म को दिशा कौन देगा।

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कुछ लोगों का विश्‍वास था कि नए नेता का चुनाव आम सहमति से होना चाहिए। वहीं अन्‍य लोगों का मानना था कि सिर्फ पैगम्‍बर के वंशज ही खलीफा बनेंगे। यह पद उनके सहायक अबु बक्र को दिया गया। वहीं, अन्‍य लोगों का मानना था कि यह पद अली को मिलना चाहिए था, जो पैगम्‍बर के चचेरे भाई और दामाद थे।

अबु बक्र के दो उत्‍तराधिकारियों की हत्‍या के बाद अली खलीफा बन गए। बाद में जहरबुझी तलवार से कुफा की मस्जिद में अली की भी हत्‍या कर दी गई। यह जगह अब इराक में है। इसके बाद खलीफा का पद उनके बेटों हसन और हुसैन को मिला। मगर, हुसैन और उनके कई रिश्‍तेदारों की इराक के करबला में 680 ईस्‍वी में हत्‍या हो गई।

उनकी शहादतगाह उन लोगों के लिए अहम हो गई, जो लोग मानते थे कि अली को पैगम्‍बर का उत्‍तराधिकारी बनना चाहिए था। मुहर्रम के महीने के दौरान हर साल उनकी मौत का शोक मनाया जाता है। उनके अनुयाइयों को शिया कहा जाने लगा।

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वहीं, सुन्‍नी अली के पहले के तीन खलीफाओं को ही मान्‍यता देते हैं। सुन्नी मुसलमान खुद को इस्लाम की सबसे धर्मनिष्ठ और पारंपरिक शाखा से मानते हैं। सुन्नी शब्द 'अहल अल-सुन्ना' से बना है, जिसका मतलब है परम्परा को मानने वाले लोग।

इस मामले में परम्परा का संदर्भ ऐसी रिवाजों से है, जो पैगम्‍बर मोहम्मद और उनके करीबियों के व्यवहार पर आधारित हो। सुन्नी उन सभी पैगंबरों को मानते हैं, जिनका जिक्र कुरान में किया गया है, लेकिन अंतिम पैगम्‍बर मोहम्मद ही थे।

इनके बाद हुए सभी मुस्लिम नेताओं को सांसारिक शख्सियत के रूप में देखा जाता है। सुन्‍नी शासकों ने खलीफा को उत्‍तरी अफ्रकी और यूरोप में विजय पताका फैराई। अंतिम खलीफा का अंत प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद तुर्क साम्राज्‍य के पतन के साथ ही हो गया।

मतों में अंतर यह है

शिया शहादत और बलिदान को महत्व देते हैं, वहीं सुन्नी कभी-कभी सार्वजनिक और राजनीतिक दायरे सहित भौतिक संसार में अल्‍लाह की शक्ति पर जोर देते हैं।

दुनिया में ऐसा है संतुलन

मुस्लिम आबादी में बहुसंख्य सुन्नी हैं और दुनिया की करीब 1.5 अरब आबादी सुन्‍िनयों की है। ये अरब देशों के साथ ही तुर्की , पाकिस्‍तान, भारत, बांग्‍लादेश, मलेशिया और इंडोनेशिया में रहते हैं। ईरान, इराक और बहरीन में शिया बहुसंख्‍यक हैं।

सऊदी के शाही परिवार के नियंत्रण में इस्‍लाम के पवित्र स्‍थल मक्‍का और मदीना आते हैं। वहीं, इराक में स्थित करबला, कुफा और नजफ शियाओं के पवित्र स्‍थान हैं। मध्‍यपूर्व में सऊदी अरब और ईरान अक्‍सर धार्मिक संघर्ष में एक दूसरे से उल्‍टा ही पक्ष लेते हैं।

यमन में उत्‍तर के शिया विद्रोहियों ने सुन्‍नी प्रभुवत्‍व वाली सरकार को उखाड़ फेंका, जिसके बाद सऊदी अरब के नेतृत्‍व में गठबंधन सेनाओं ने वहां आक्रमण किया। सीरिया में सुन्‍नी बहुसंख्‍यक हैं। राष्‍ट्रपति बशर अल-असद की अलावित शिया संप्रदाय, जिसका सरकार पर लंबे समय से प्रभुत्‍व है, वह खूनी गृह युद्ध के बावजूद सत्‍ता में बनी है।

इराक में शिया नेतृत्‍व वाली सरकार और सुन्‍नी संप्रदाय के लोगों के बीच पनपे असंतोष ने इस्‍लामिक स्‍टेट को सर उठाने का मौका दिया।

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