नई दिल्ली। फ्रांस की दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों यहां तैयार हो रहे 'लिटिल सन' को देखने भी गए। इस अंतरराष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर पर हर जगह मेड इन इंडिया की छाप नजर आ रही है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक मिलकर धरती पर ही एक छोटा सूर्य बनाने की कवायद में लगे हैं और अगर इसमें सफलता मिलती है तो दुनिया को असीमित उर्जा मिलेगी।

20 अरब यूरो (लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये) की लागत वाले इस बड़े प्रोजेक्ट में भारत पूर्ण साझेदार है। इस प्रोजेक्ट को अंतरराष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर (आइटीईआर) प्रोजेक्ट या द पाथ नाम दिया गया है। इसके आधार को तैयार कर लिया गया है, जिसमें लगे सभी उपकरणों पर मेड इन इंडिया लिखा हुआ है। दुनिया के बेहतरीन वैज्ञानिक सूरज के संलयन ऊर्जा का अध्ययन करने के लिए पृथ्वी पर सूरज की प्रतिकृति तैयार करने के प्रयास में लगे हैं।

भारत ने इस प्रोजेक्ट के लिए 17,500 करोड़ रुपये दिए हैं। फ्रांस की यात्रा पर गए मोदी ने इस मेगा प्रोजेक्ट का निरीक्षण किया और वहां चल रहे कामकाज का अवलोकन भी किया।

भारत ने प्रोजेक्ट लागत का लगभग दस फीसद हिस्सा दिया है। उसे प्रोजेक्ट की पूरी तकनीकी जानकारी भी मिल रही है। 21वीं सदी के दुनिया के इस सबसे बड़े वैज्ञानिक प्रोजेक्ट में भारत को शामिल साझेदारी करने का मौका मिल रहा है। यह प्रोजेक्ट पृथ्वी का अब तक सबसे महंगा वैज्ञानिक प्रोजेक्ट है। आइटीईआर का वजन लगभग 28,000 टन होगा।

भारत ने दिया सबसे बड़ा रेफ्रिजरेटर

भारत ने इस प्रोजेक्ट के लिए दुनिया का सबसे बड़ा रेफ्रिजरेटर उपलब्ध कराया है। इस रेफ्रिजरेटर में ही यह विशेष रिएक्टर है। इस रेफ्रिजरेटर को गुजरात में लार्सन एंड टूब्रो द्वारा तैयार किया गया है और इसका वजन 3,800 टन है और इसकी ऊंचाई कुतुब मीनार की ऊंचाई के लगभग आधी है।

आइटीईआर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. टिम लूस का कहना है कि भारत मूल्यवान साझेदार है। भारत ने क्रायोस्टेट जैसे अहम उपकरण तैयार किए हैं, जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा थर्मो बोतल है।

मिलेगी असिमीत उर्जा

फ्रांस के सुदूर क्षेत्र में स्थापित किए जा रहे इस रिएक्टर के निर्माण में सौ से ज्यादा भारतीय भी जुटे हुए हैं। असंभव को संभव करने की कोशिशों में जुटे वैज्ञानिक इस प्रयोग के जरिए सूरज के असल ऊर्जा के स्त्रोत का पता लगाने का प्रयास करेंगे। अगर वैज्ञानिक अपने इस प्रयोग में सफल होते हैं तो दुनिया को असीमित स्वच्छ ऊर्जा मिलेगी।

इस प्रोजेक्ट को अमेरिका, रूस, दक्षिण कोरिया, चीन, जापान, यूरोपीय संघ और भारत बराबर की साझेदारी के साथ संयुक्त रूप से तैयार कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से जुड़े देशों की आबादी दुनिया की आधी आबादी और 85 फीसद जीडीपी के बराबर है।

आइटीईआर के वैज्ञानिक डॉ. मार्क हेंडरसन ने बताया कि उनके लिए अभी यह स्थान दुनिया का सबसे ठंडा स्थान है। लेकिन आने वाले दिनों में यह दुनिया का सबसे गर्म स्थान होने वाला है क्योंकि इसका तापमान 15 करोड़ डिग्र्री सेल्सियस हो जाएगा, जो सूरज के तापमान से भी दस गुणा ज्यादा है।

Posted By: Ajay Barve

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