मल्टीमीडिया डेस्क। वह बैसाखी का दिन था जब आजादी के दीवाने अपने नेताओं की आव्हान पर जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे। उस समय देशभर मे रौलेट एक्ट के विरोध में विरोध-प्रदर्शन चल रहा था।

इस अधिनियम के अनुसार भारत की ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति को देशद्रोह के शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी और उस व्यक्ति को बिना किसी जूरी के सामने पेश किए जेल में डाल सकती थी।

इसके अलावा पुलिस दो साल तक बिना किसी भी जांच के, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में भी रख सकती थी। इस अधिनियम ने भारत में हो रही राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए, ब्रिटिश सरकार को एक ताकत दे दी थी।

साल 1919 में सत्याग्रह आंदोलन देशभर में चल रहा था। इस दौरान अमृतसर में भी 6 अप्रैल, 1919 में इस आंदोलन के तहत हड़ताल की गई थी और रॉलेक्ट एक्ट का विरोध किया गया था। अहिंसक तरीके से हो रहा आंदोलन अचानक हिंसक हो गया था।

9 अप्रैल को डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया था। ये दोनों नेता काफी लोकप्रिय थे। इससे गुस्साए लोगों ने रेलवे स्टेशन, तार विभाग सहित कई सरकारी दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया था। इस दौरान भीड़ ने तीन अंग्रेजों की हत्या भी कर दी।

इसके बाद अमृतसर की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच डायर को सौंपी गई। पंजाब के हालत को देखते हुए राज्य के कई शहरों में ब्रिटिश सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया था।

इस लॉ के तहत, जहां पर भी तीन से ज्यादा लोगों को इकट्ठा पाया जा रहा था, उन्हें पकड़कर जेल में डाला दिया जा रहा था। फिरंगी सरकार का विरोध करने के लिए 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग में बड़ी संख्या में लोग इक्ट्ठा हुए। उस वक्त करीब 20,000 लोग इस बाग में मौजूद थे।

दोपहर 12:40 बजे, डायर को जलियांवाला बाग में होने वाली सभा की सूचना मिली। सूचना मिलने के बाद डायर करीब 4 बजे अपने दफ्तर से करीब 150 सिपाहियों के साथ इस बाग के लिए रवाना हो गया।

डायर ने बिना कोई चेतावनी दिए, अपने सिपाहियों को गोलियां चलाने के आदेश दे दिए। कहा जाता है कि इन सिपाहियों ने करीब 10 मिनट तक गोलियां चलाई थी।

वहीं गोलियों से बचने के लिए लोग भागने लगे, लेकिन इस बाग के मुख्य दरवाजे को भी सैनिकों द्वारा बंद कर दिया गया था और ये बाग चारो तरफ से 10 फीट तक की दीवारों से बंद था। ऐसे में कई लोग अपनी जान बचाने के लिए इस बाग में बने एक कुएं में कूद गए।

इस हत्याकांड में 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और 1500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। वहीं ब्रिटिश सरकार ने केवल 370 लोगों की मौत की पुष्टी की थी। इसके बाद देशभर में जनरल डायर के फैसले पर सवाल उठाए गए थे। हत्याकांट की जांच को लेकर बनाई गई समिति ने डायर को हत्याकांड का दोषी ठहराया था। 13 मार्च 1940 में ऊधमसिंह ने आखिर हत्याकांड का बदला ले लिया। उधम सिंह ने केक्सटन हॉल में जनरल डायर को मोली मारकर मौत के घाट उतार दिया।

Posted By: Yogendra Sharma