देहरादून। कांवड़ यात्रा के दौरान भक्तों को कांवड़ ले जाते हुए तो सभी ने देखा है। लेकिन कांवड़ को तैयार करने वाले हाथों की तरफ शायद ही किसी का ध्यान गया हो। आप ये जानकर हैरान होंगे की देश में एक जगह ऐसी भी है जहां इन कांवड़ों को तैयार करने के लिए मुस्लिम कारीगर जी जान से जुटे होते है। इसी से उनका रोजगार चलता है। सालों से मुस्लिम परिवार इन कांवड़ों को तैयार कर रहा है।

उत्तराखंड के ज्वालापुर में मुस्लिम कारीगरों द्वारा कांवड़ तैयार करते आसानी से देखी जा सकती है। इन कारीगरों द्वारा बांस से तैयार की गई कांवड़ बेहद प्रसिद्ध हैं। श्रध्दालु इन्हें ही ले जाना पसंद करते हैं।

कई दशकों से यहां मुस्लिम परिवार कांवड़ को बना रहे हैं। साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड राज्य बना था। उसके बाद से यहां के तीर्थ स्थान में कांवड़ियों के आने की तादाद में तेजी से इजाफा हुआ है। आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि कांवड़ यात्रा के समय इन कांवड़ों की इतनी ज्यादा मांग होती है कि यहां पर उत्तर प्रदेश के मुस्लिम कारीगर भी इस इलाके में ज्यादा से ज्यादा कांवड़ तैयार करने के पहुंचते हैं।

ज्वालापुर की कैथवाड़ा कॉलोनी में रहने वाले मोहम्मद इजराइल 1980 से कांवड़ तैयार कर रहे हैं। उन्हें श्रावण मास का हर साल इंतजार रहता है, क्योंकि कांवड़ियों के आने से उनकी कमाई काफी बढ़ जाती है।

इजराइल कहते हैं कि जैसे किसान फसल उगाने के लिए मानसून का इंतजार करता है उसी तरह हम लोग श्रावण मास का इंतजार करते हैं। कांवड़े बेचकर होने वाली कमाई से हम लोग साल का ज्यादातर वक्त गुजार लेते हैं।

कांवड़ निर्माण में मुस्लिम पुरुषों के साथ ही परिवार की महिलाएं भी हाथ बंटाती हैं। स्थानीय पुलिस प्रशासन इस साल हरिद्वार में 3 करोड़ कांवड़ियों के आने की उम्मीद जता रही है।

पंतदीप के कांवड़ बाजार, गंगा नदी के किनारे और हर की पौड़ी की ज्यादातर कांवड़ की दुकानें मुस्लिम परिवारों द्वारा ही संचालित की जा रही है। इन कांवड़ों की कीमत 100 रुपए से शुरू होकर उसके आकार, वजन, ऊंचाई और उसमें की गई साज सज्जा के हिसाब से हजारों तक में जाती है।

Posted By: Neeraj Vyas

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