किस्सा कुछ यूं था: वर्तमान दौर में लोगों के मनोरंजन के लिए इंटरनेट, सोशल मीडिया, टीवी से लेकर तमाम संसाधन उपलब्ध हैं, मगर जिस दौर में यह सब नहीं था, तब लोग अपने मनोरंजन के लिए क्या किया करते थे? इस प्रश्न का उत्तर महानायक अमिताभ बच्चन के बाबूजी यानी हिंदी के ख्यात कवि हरिवंशराय बच्चन दे गए हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक में बाकायदा इसका उल्लेख किया है कि लोग किस तरह कबूतरबाजी, बुलबुलबाजी या तीतरबाजी में अपना हुनर आजमाते थे और गांव-कस्बों-शहरों के लोगों का मनोरंजन करते थे। कमाल की बात ये होती थी कि ऐसा करने वाले लोगों की एक आवाज पर सैकड़ों कबूतर आसमान में ही लड़ने लगते या फिर वह व्यक्ति जिस छत पर जाने का इशारा करता, सारे कबूतर उसी पर जाकर बैठते।

ये कमाल का किस्सा आजादी के पहले के दौर का है। तब उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जन्मे हरिवंशराय बच्चन के घर से कुछ ही दूरी पर जमकर कबूतर, तीतर और बुलबुलबाजी होती थी। किशोर हरिवंशराय यह सब देखने कौतुहल से जाया करते। वे अक्सर देखते कि शाम होते ही तीतर पालक अपने तीतरों को पिंजरे में लेकर गलियों से निकलने लगते। वे गली-मोहल्लों में हांका भी लगाते जाते कि आज फलां इलाके में तीतरबाजी होगी। तीतरों की लड़ाई के पहले वे लोग शहर में ऐसे मकानों की दीवारें ढूंढते, जिनमें दीमक लगी होती थी। दरअसल, तीतरों को भोजन के रूप में दीमक बहुत प्रिय है। तीतर, कबूतर और बुलबुलों को भोजन करवाकर इनके पालक कस्बे शहर की तय जगह पर पहुंच जाते। वहां पहले ही शौकीन दर्शकों और बच्चों की भीड़ जुट जाती थी। फिर ये लोग एक-एक करके कबूतरों, तीतरों और बुलबुलों को आपस में लड़वाते। इस लड़ाई के लिए बाजी लगती और देखने वाले पैसे का दांव लगाते। खेल शुरू होने पर एक कबूतरबाज के सैकड़ों कबूतर झुंड बनाकर एक साथ आसमान में उड़ते तो दूसरे व्यक्ति के कबूतर दूसरा झुंड बनाकर। फिर जैसे ही ये लोग मुंह से अनूठी आवाजें निकालते, कबूतर आसमान में ही लड़ने लगते। जिसका झुंड हारता, वह जीतने वाले को एक सेर घी या कबूतरों का दाना आदि देता था।

(हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा से साभार)

Posted By: Arvind Dubey

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