नई दिल्ली। देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने की भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की मांग पर अल्पसंख्यक आयोग का कहना है कि इस मांग पर विचार करना अल्पसंख्यक आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. यह केंद्र सरकार के दायरे में आता है कि किसे अल्पसंख्यक का दर्जा दे. अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि आठ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों को मिलने वाला विशेष लाभ नहीं मिलता. आयोग ने याचिकाकर्ता उपाध्याय को लिखित जवाब भेजा है.

सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल अर्जी में अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि आठ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं. इसके बाद भी उन्हें अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित कोई लाभ नहीं मिलता. 2017 में शीर्ष अदालत ने उपाध्याय को अल्पसंख्यक आयोग के समक्ष अपनी बात रखने के लिए कहा था. उनके ही ज्ञापन के जवाब में अल्पसंख्यक आयोग ने अब यह जवाब दिया है.

उपाध्याय का कहना है कि भारतीय संविधान या किसी भी भारतीय कानून में “अल्पसंख्यक” शब्द की परिभाषा या व्याख्या नही है. अल्पसंख्यक का शाब्दिक अर्थ है, ‘ बहुत कम संख्या वाला’. वर्तमान समय में अल्पसंख्यक शब्द का इस्तेमाल मुसलमान और ईसाइयों के लिए ही होता है. आपातकाल में इंदिरा गांधी ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम मुसलमानों को ध्यान में रखकर ही बनाया था. 1986 की नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित अल्पसंख्यक बहुल 40 जिलों की सूची भी मुसलमानों की जनसंख्या को ध्यान में रखकर तैयार हुई थी.

2011 की जनगणना के अनुसार 28 राज्यों में से सात (जम्मू और कश्मीर, पंजाब, अरुणाचल, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम तथा मेघालय ) और सात केंद्र शासित प्रदेशों से एक लक्षद्वीप में हिंदू अल्पसंख्यक हैं. हिंदू अल्पमत वाले इन आठ में से तीन (नगालैंड, मिजोरम तथा मेघालय) में ईसाई और दो (जम्मू और कश्मीर, लक्षद्वीप) में मुस्लिम जबकि पंजाब में सिख बहुसंख्यक हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार देश के कुल 640 जिलों में से 110 में हिंदू अल्पसंख्यक हो गया है.

उपाध्याय का कहना है कि 1961 में मेघालय में ईसाई जनसंख्या 35.21 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 74.59 प्रतिशत हो गयी है. 1971 में अरुणाचल प्रदेश में ईसाई कुल जनसंख्या में मात्र 0.78 प्रतिशत थे जो 2011 में बढ़कर 30.26 प्रतिशत हो गये है. अरुणाचल की तरह ही 1951 में मणिपुर में हिंदू 60.12 तथा ईसाई 11.84 प्रतिशत थे. 2011 की जनगणना में हिंदू 60.12 प्रतिशत से घटकर 41.38 तथा ईसाई 11.84 प्रतिशत से बढ़कर 41.28 प्रतिशत हो गये हैं. ईसाई जनसंख्या में हो रही इस अप्रत्याशित वृद्धि के आधार पर कहा जा सकता है कि मेघालय, मिजोरम नगालैंड के साथ ही साथ अरुणाचल और मणिपुर भी ईसाई बहुसंख्यक प्रदेश बन गए है.

देश में मुस्लिम और ईसाई बहुल्य प्रांत, जिला और प्रखंड बनाने हेतु कई षड़यंत्र चल रहे है. उसमें प्रमुख है क्षेत्र विशेष में योजनाबद्ध तरीके से धर्म परिवर्तन कराना, बाहर से मुसलमानों और ईसाइयों को लाकर बसाना और हिंदुओं को भागने हेतु मजबूर करना. हरियाणा में गुरुग्राम और फरीदाबाद के मुस्लिम बहुल हिस्से को काटकर पहले मेवात जिला बनवाया और अब नाम बदलकर उसे नूंह कर दिया. 1990 में बिहार में लालू प्रसाद जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुस्लिम बहुल अनुमंडल किशनगंज को जिला बना दिया. पश्चिम बंगाल में दिनाजपुर जिले को उत्तरी और दक्षिणी में विभाजित कर दिया गया. 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तरी दिनाजपुर जिले की मुस्लिम आबादी 49.92 प्रतिशत थी जो इन आठ वर्षों में मुस्लिम बहुल में बदल गई है. मुस्लिम और ईसाई बहुल प्रांत, जिला और प्रखंड में हिंदुओं की स्थिति कैसी होती है, इसका ताजा मामला पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आ रहा है। मेरठ में मुसलमानों से भयभीत हिंदुओं ने अपने मकान के बाहर ‘मकान बिकाऊ है’ की तख्ती लटका दी.

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि जो लोग कश्मीर में कश्मीरियत और इंसानियत की बात करते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए कि 1990 में घाटी से लाखों हिंदुओं के पलायन के बाद भी घाटी के अल्पसंख्यक हिंदू और सिख भय से अपने साथ घर की महिलाओं को रखने का साहस नहीं जुटा पाते हैं. 2011 में घाटी में कुल हिंदू जनसंख्या 1,68,833 थी जिसमें महिलाओं की संख्या मात्र 15764 यानी मात्र 9.33 प्रतिशत ही थी. 1990 में मुस्लिम बहुल कश्मीर से जैसे हिंदुओं का पलायन हुआ उसी प्रकार मुस्लिम बहुल केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप से भी हिंदुओं का पलायन हुआ है. लक्षद्वीप में 1991 में 2339 हिंदू थे जो 2011 में घटकर 1788 रह गये है. इस 1788 में भी महिलाओं की संख्या मात्र 185 है. मुस्लिम बहुल ही नही, ईसाई बहुल मिजोरम से भी अल्पसंख्यक हिंदुओं का पलायन हुआ है. मिजोरम में 1981 में 35,245 हिंदू थे जो 2011 में घटकर 30,136 हो गये हैं.

उपाध्याय ने कहा कि 1947 में धर्म के आधार पर ही देश का विभाजन हुआ था लेकिन हमारे माननीय उससे सीख लेने के लिए तैयार नहीं हैं. समय आ गया है कि धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक बहुसंख्यक का खेल पूरी तरह बंद किया जाए अन्यथा ‘अल्पसंख्यक' को परिभाषित किया जाए और 'अल्पसंख्यक कौन’ का आधार जिला या राज्यस्तर पर जनसंख्या को मानकर तय किया जाये. उपाध्याय का यह भी कहना है कि जिस तरह मुसलमानों की स्थिति के अध्ययन हेतु सच्चर आयोग गठित किया गया था उसी प्रकार आठ राज्यों में हिंदुओं के ऊपर हो रहे जुल्म की जांच के लिए भी एक आयोग का गठन हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए.

आपको बात दें कि अश्वनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में मांग की थी कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) को समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि यह धारा मनमानी, अतार्किक और अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है. इस धारा के तहत केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के असीमित और मनमाने अधिकार प्राप्त हैं. उपाध्याय 23 अक्टूबर 1993 के उस नोटिफिकेशन को भी अवैध घोषित करने की मांग किया है जिसमें मुसलमान ईसाई बौद्ध पारसी और सिख को अल्पसंख्यक घोषित किया गया था।

Posted By: Arvind Dubey