- संदीप नाईक

किसी ने फोन करके कहा कि सर आपको जोड़ नही पा रहा हूं लगता है पांच हजार दोस्तों की सीमा पूरी हो गई है, किसी को निकाल दें और मुझे जोड़ लें। मैं स्तब्ध था कि यह कौन है और क्या कह रहा है, मनुष्य जीवन में मित्रता की कोई सीमा है और जो बन गया है क्या उसे हटाकर नया जोड़ा भी जा सकता है। थोड़ा मुश्किल था,मैंने अपने कुछ युवा मित्रों से पूछा कि क्या करूं, तो बहुत सहज भाव से उन्होंने बोला जो आपको जम नही रहें उनको अनफ्रेंड कर दो और नए जोड़ लो बहुत सरल है! और यह तो आसान प्रक्रिया है सारे विकल्प वहीं मौजूद हैं, उनके इस साक्षी भाव पर हैरान था।

औचक-सा रह गया मैं और जब पलटकर अपनी यादों की गठरी को खोला तो मेरे पास स्मृतियों के खजाने में हजारों दोस्त मिले जो अभी भी पूरी शिद्दत और अपनी बुलंद उपस्थिति के साथ मेरे साथ मेरे भीतर धड़कते हैं और जिनके होने से ही मैं हूं और लगता है कि जब मैं कहीं होता हूं और कुछ कहता हूं तो मेरी उस उपलब्धि, विचार, परिपक्वता और एक संपूर्ण आकार में उभरी तस्वीर में असंख्य बिंबों, बिंदुओं और अकल्पित रंगों का समायोजन है जिन्हें दोस्त कहता हूं।

बचपन का मित्र अफजल हो या आनंद हो, अनिल जो ट्‌यूशन के हरिसिंह माट्‌साब के यहां सायकिल पर ले जाता था, स्कूली दिनों में बरसात के मौसम में छपाक-छपाक करते हुए मेरा बस्ता उठाकर मुझे नाले पार करवाने वाला दिलीप तो असमय ही चला गया। कॉलेज के दिनों में भरी दुपहरी सायकिल पर लादकर ले जाना वाला राकेश आज अमेरिका मेंप्रतिष्ठित डॉक्टर है जो हमसे मिलने एक बुलावे पर आ जाता है। मनोज, रवि, अरविंद, अनु, शोभा से लेकर सचिन, चिन्मय, विनोद, रैक्स, स्मिता, सपना, चैताली और प्रक्षाली, नीलेश किस-किसको रिमूव करूं, अरुणाचल के तवांग में बैठी पत्रकार मित्र को या राजस्थान की शबनम जिससे लड़ते-झगड़ते उम्र हो गई पर नेह की डोर नहीं टूटी, सुकमा के उन मित्रों को भूलूं जो एक समय मोटा धान खाकर कड़ा संघर्ष कर रहे हैं या वारंगल - खम्मम के जंगलों में शिक्षा की ज्योत जला रही युवा लड़कियों को अनफ्रेंड करूं जो मेरी ताकत हैं। पुष्पेंद्र जैसे युवा साथियों को कैसे हटा सकता हूं जो बिगाड़ के डर से नहीं डरते और हर बार हाथ पकड़कर कुछ भी बुरा करने से रोक लेते हैं, सुघोष हो या अम्बर जो अपनी विलक्षण दृष्टि से कविता कहानी की समझ समृद्ध करते हैं या मंडला में गजानन को भूलूं जो आदिवासियों के बीच रहकर अलख जगा रहा है, अपने दो पैरों से दुनिया नापने वाला आलोक या रोज दिनभर पढ़ने की खुराक देने वाले गिरीश शर्मा को

अपने जीवन के लगभग उत्तरार्ध में मित्र दिवस के भव्य बाजार और आयोजन देखे हैं, वायवीय रिश्तों से बुने इस संजाल के लपेटे में हमसब हैं पर कुछ बहुत खूबसूरत रिश्ते मैंने मानवीय रिश्तों से परे जाकर भी देखे हैं। जब एक फौजी स्कूल में काम करता था और फौजियों का जो रिश्ता देश से था- उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता, आज भी वास्तविक जीवन में हम देखते है कि जब कोई लाश सियाचिन या सरहद से आती है घर और उसके साथ जो सैनिकों की अनुशासित टुकड़ी आती है - कितनी संयत और स्नेहिल होती है। पिछले दिनों जिले के एक युवा शहीद के घर जाने का अवसर मिला, अंतिम क्रिया के बाद उसके सैनिक दोस्तों से उसकी मित्रता, खिलंदड़पन, बेबाकी और हिम्मत के किस्से सुने तो पूरे शरीर पर झुरझुरी आ गई, बातचीत के आखिर में एक युवा लांस नायक ने कहा जो गढ़वाल रेजिमेंट का था, 'हम तो मानते ही कि कोई शहीद हो गया, बस अब कोई सूचना नहीं आएगी उसकी और फौज में 'नो न्यूज इज गुड न्यूज' होता है साब जी' यह कहकर सारे संगी साथी शून्य में ताक रहे थे - बताइये क्या इसे भी दोस्ती कहेंगे, भावुक हो गए हम सब पर उसी शाम वो सब लौट गए कि सरहदें सुरक्षित है और देश से दोस्ती है।

अगस्त माह दोस्ती का भी माह है, अपनी आजादी के जश्न का भी और भाई बहन केपवित्र प्यार में पगे बंधन को रक्षा सूत्रों से जन्म-जन्मांतर तक बांधने का भी, पर इन तीनों के मूल में देखें तो यह जुड़ने का माह है। सावन के तीज त्योहार जहां समुदाय को जंगल, पेड़-पौधों से जोड़ते हैं, स्वतंत्रता दिवस की खुशी हमे देश से जोड़ती है और मित्र दिवस और रक्षा बंधन मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है।

मित्रों को फ्रेंडशिप बेल्ट बांधते समय, आजादी की नुक्ती खाते हुए और रक्षा बंधन मनाते हुए एक पौधा कम से कम इस धरती में जरूर रोपें और उसकी देखभाल करने का वैसा ही संकल्प लें - जैसे देश को, बहन को और मित्र को सदैव साथ और सुरक्षा का वादा कर निभाते है हम तभी अगस्त होने की सार्थकता भी है।

Posted By: Navodit Saktawat

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