नई दिल्ली। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनएमसी) राष्ट्रीय आंकड़े की जगह राज्यवार जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यकों के निर्धारण की मांग ठुकरा सकता है। यह जानकारी रविवार को एक अधिकारी ने दी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तीन सदस्यीय समिति कुछ दिनों में भाजपा नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय को आयोग की रिपोर्ट की प्रति सौंपेगी। उपाध्याय ने इस मुद्दे पर शीर्ष कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर रखी है।

आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि राज्य-स्तरीय जनसंख्या आंकड़े के आधार पर अल्पसंख्यक समुदायों के निर्धारण से कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। भविष्य में लोग जिला और प्रखंड स्तर की जनसंख्या के आधार निर्धारण की मांग करेंगे।

अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत अल्पसंख्यक की परिभाषा में बदलाव की गुंजाइश नहीं है। इसलिए राज्यवार आधार पर अल्पसंख्यक का निर्धारण करने की मांग ठुकराई जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने हमें मामले में याची को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट तैयार है और कुछ दिनों में सौंपी जा सकती है।

शीर्ष कोर्ट के निर्देश पर एनसीएम के अध्यक्ष सैयद जीएच रिजवी ने मुद्दे पर रिपोर्ट सौंपने के लिए फरवरी में उपसमिति गठित की थी। आयोग के उपाध्यक्ष जार्ज कुरियन इसके प्रमुख थे। 11 फरवरी को कोर्ट ने उपाध्याय से इस मुद्दे पर एनसीएम से संपर्क करने और आयोग को उनके आवेदन पर तीन महीने में फैसला लेने के लिए कहा था। अपनी अर्जी में भाजपा नेता ने समुदाय की राज्यवार जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यक को परिभाषित करने करने की मांग की थी।

उपाध्याय ने जुलाई में नई अर्जी दायर की जिसके बाद शीर्ष कोर्ट ने अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सहायता करने को कहा है। याचिका में कहा गया है कि 2011 की जनगणना के अनुसार लक्षद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, जम्मू एवं कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। उपाध्याय ने 23 अक्टूबर 1993 को जारी सरकारी अध्यादेश को भी चुनौती दी है। इस अध्यादेश के जरिये पांच समुदायों मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया गया। बाद में जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक घोषित किया गया।

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