नवीन कुमार मिश्र. पटना. दास्तां सन् 1904 की है। एक सितंबर के अंक में ‘बिहारबंधु’ लिखता है : ‘सुनने में आया है कि किसी यूरोपियन कंपनी ने पटने में बेगमपुर से मीठापुर स्टेशन तक बिजली की ट्राम चलाने की आज्ञा मांगी है।’

अफसोस कि पटना के वाशिंदों का वह सपना तब पूरा नहीं हुआ। गजब यह कि अश्वचालित ट्राम के दिन भी लद गए। एक नवंबर 1903 के अंक में ‘बिहारबंधु’ लिखता है : ‘पटना ट्रामवे तो उठ गया पर उसकी लाइन अब तक बिछी हुई है। सुनने में आया है कि अब यह उखाड़ दी जाएगी। उसका उखड़ जाना ही ठीक है, क्योंकि इक्के गाड़ियों में अक्सर ठोकर लगकर लोगों को चोट लगती है। लोहा उखड़ जाने से सड़क भी साफ निकल आएगी।’

दरअसल, उन दिनों कोलकाता में प्रोत्साहन और बिजली के कारण ट्राम का विस्तार होता गया, लेकिन पटना में ऐसा नहीं हो सका।

सन् 1898-99 के दौरान की एक प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, ‘पटनासिटी ट्रामवे से 31639 रुपये की आमदनी हुई, जबकि उस पर खर्च 27242 रुपये रहा। फायदा मामूली है और तीन दुर्घटनाएं भी हुईं।’

आज भी कुछ बहुत पुराने मकानों में ट्राम लाइन का लोहा बीम के रूप में दिख सकता है। सूबे यानी बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल या कहें छोटे लाट ने बांकीपुर से खाजेकलां तक इससे सफर किया था।

फरवरी 1900 में बिहारबंधु में छपी दिलचस्प खबर पढ़िए : ‘छठी तारीख को 9.30 बजे रात को सैयद खुरशैद नवाब ने अपने मकान पर मोहल्ला खाजेकलां में छोटे लाट और उनके साथियों को दावत दी थी।

ट्राम की गाड़ी रोशनी और फूल आदि से सजाई गई थी। उसी पर बैठकर बांकीपुर से साहब लोग आए थे। सब मिलाकर प्राय: सौ आदमी थे। ’

आकाशी रेल : करीब सवा सौ साल पहले फ्रांस में जमीन से ऊपर चलने वाले मेट्रो रेल का परिचालन शुरू हुआ था। तब 29 जनवरी, 1885 के अंक में बिहारबंधु ने खबर प्रकाशित की : एक फ्रेंच इंजीनियर ने नई तरह की ट्राम-वे गाड़ी ईजाद की है।

इसे एक तरह की आकाशी रेल कहना चाहिए। इसके लिए लंबी राह और सड़क बनाने की जरूरत नहीं है। राह के बदले लोहे के दो-दो खंभे बराबर गड़े रहते हैं।

Posted By:

  • Font Size
  • Close