योगेंद्र शर्मा। पाकिस्तान का नाम जब जेहन में आता है तो मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर अपने-आप उभर कर सामने आ जाती है। हिंदूस्तान के जनमानस के लिए वह बंटवारे के खलनायक रहे तो पाकिस्तानी अवाम ने उनको कायदे आजम के खिताब से नवाजा। बेशुमार दौलत, बेपनाह इज्जत और अपने मुल्क के बाशिंदों के दिलों में जगह बनाने वाले इस शख्स के लिए एक समय ऐसा भी आया, जब वह चैन से दुनिया से रुखसत होने के लिए तरसते रहे। मजहब के नाम पर लिए देश की सरहदों को बदलने वाले इस शख्स को अपने आखिरी दिनों में बेहद मुश्किल भरे हालातों से गुजरना पड़ा।

पाकिस्तान के निर्माताओं मे मोहम्मद अली जिन्ना का नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है, लेकिन हकीकत यह भी है कि उस समय कई वहाबी विचारधारा वाले नेताओं, जमीदारों और मुस्लिम रजवाड़ों ने भी पाक की सरजमी पर इस्लामी झंड़ा फहराने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। आखिरकार खून की नदियां बहाने के बाद एक अलग मुल्क का सपना हकीकत में तब्दील हो गया।

जिन्ना पर था बहन फातिमा का पूरा प्रभाव

बंटवारे के बाद शुरू हुआ पाकिस्तान में सत्ता में बने रहने या आगे बढ़ने का खेल। सत्ता की सांप-सीढ़ी में अगुआ जिन्ना थे और जिन्ना पर उनकी बहन फातिमा का पूरा प्रभाव था। फातिमा कायदे आजम की राजनीति से लेकर सभी तरह की विरासत की इकलौती वारिस थीं। पाकिस्तान के निर्माण के साथ ही जिन्ना अकेले पड़ने लगे थे। निर्माण के साथ ही नए निजाम की जंग भी शुरू हो गई, जिसमें एक तरफ जिन्ना थे तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश से कराची पहुंचे खलीकुज्जमान, सीमाप्रांत के मुख्यमंत्री अब्दुल कयूम, पंजाब के मुख्यमंत्री नवाब ममरोट सहित पूर्वी बंगाल के बड़े कद्दावर नेता थे। पाक के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली परदे के पीछे के नायक थे, जो जिन्ना के बढ़ते प्रभाव को नेस्तनाबूद कर आगे बढ़ना चाहते थे।

जिन्ना वैसे तो अविभाजित भारत से ही बीमार थे और यह भी तय था कि नफरतों का बवंडर खड़ा कर देश के टुकड़े करने वाला यह शख्स कुछ ही दिनों का मेहमान है, लेकिन जिन्ना को इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि उनके ख्वाबों के मुल्क में उनको ऐसी बदतर मौत नसीब होगी।

जब जिन्ना ने कहा था. ‘मेरी जीने की ईच्छा खत्म हो गई है’

जिन्ना के अंतिम दिनों में ज्यारत के पहाड़ों में उनकी कोठी में बहन उनके साथ थी। फातिमा को लियाकत अली पर रत्तीभर भी विश्वास नहीं था। उन्होंने सरकारी डॉक्टर को दरकिनार कर एक मशहूर प्राइवेट डॉक्टर को तवज्जो दी। जब लियाकत अली जिन्ना से मिलने पहुंचे तो जिन्ना का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने इलाज का ब्यौरा उनको देने से मना कर दिया। उसके बाद जिन्ना ने लियाकत अली को बुरी तरह फटकारा। लियाकत अली जिन्ना को गंभीर अवस्था में छोड़कर कराची आ गए।

14 अगस्त 1948 को जिन्ना ने अपने डॉक्टर मिस्टर बक्श से कहा कि ‘मैं जिंदा रहना चाहता था, लेकिन अब यह बात कोई मायने नहीं रखती कि मैं जीवित रहूं या मर जाऊं।‘ जिन्ना की आंखे आंसूओं से भरी हुई थीं। हकीकत में जिन्ना की जीने की इच्छा खत्म होने की वजह लियाकत अली और दूसरे बड़े नेताओं का विश्वासघात था।

अंतिम समय में सड़क के किनारे गंभीर अवस्था में तन्हा थे जिन्ना

21 सितंबर 1948 को जिन्ना ने कराची जाने की ख्वाहिश जाहिर की। इसकी सूचना कराची पहुंचा दी गई। तय समय शाम को 4 बजकर 15 मिनट पर जिन्ना का विमान कराची के मौरीपुर विमानतल पर पहुंच गया, लेकिन खबर देने के बावजूद जर्जर हो चुके जिन्ना की अगवानी के लिए लियाकत अली, कोई मंत्री या सरकारी अधिकारी मौजूद नहीं था। जिन्ना को एयरपोर्ट से सेना की एक एंबूलेंस में स्ट्रेचर पर लेटाकर रवाना किया। थोड़ी दूर जाने के बाद यह गाड़ी खराब हो गई। एक घंटे तक अकेले एंबुलेंस के चालक ने गाड़ी को ठीक करने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं होने पर वह खुद कराची शहर में दूसरी गाड़ी लेने के लिए गया।

उस वक्त जिन्ना की देखरेख कर रही नर्स सिस्टर डनहम ने घटना का विवरण देते हुए बताया कि, ‘हमारी गाड़ी शरणार्थियों की एक बस्ती के नजदीक खड़ी थी। गाड़ी के पास कूड़े-करकट का ढेर लगा हुआ था, जिसके ऊपर हजारों मक्खियां भिनभिना रही थीं। उस कूड़े के ढेर से उठी कुछ मक्खियां जिन्ना को परेशान कर रही थीं। मैं एक गत्ते के टुकड़े से उन मक्खियों को भगाने की कोशिश कर रही थी। कुछ समय के लिए केवल मैं ही उनके पास थी। जिन्ना ने कृतघ्नता प्रकट करने के लिए अपना कमजोर हाथ मेरे ऊपर रखकर जिस कातर दृष्टी से मेरी ओर देखा, उसको मैं कभी भूल नहीं सकती। बीमारी से जर्जर जिन्ना बोल नहीं सकते थे, लेकिन उनकी आंखों से बहते अश्क सब कुछ बयां कर रहे थे।‘

कुछ शरणार्थी बच्चे आसपास खेल रहे थे, वहीं कुछ लोग गाड़ी के पास से भी गुजर रहे थे। क्योंकि उनको यह पता नहीं था कि पास में खड़ी एक बेकार हो चुकी गाड़ी में पाकिस्तान का जनक अंतिम सांसे ले रहा है। दो घंटे बाद यानी 6 बजकर 10 मिनट पर दूसरी गाड़ी आई। जिन्ना को दूसरी गाड़ी में डालकर राजभवन में उनके कमरे में ले जाया गया। डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया, लेकिन रात 10 बजे उन्होंने अपने सपनों के मुल्क पाकिस्तान को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

प्रधानमंत्री लियाकत अली जिन्ना की मौत के वक्त शराब पी रहे थे

जिन्ना की मौत के वक्त प्रधानमंत्री लियाकत अली और उनके मंत्रीमंडल का कोई भी सहयोगी वहां पर उपस्थित नहीं था। लियाकत अली उस वक्त फ्रांस के दूतावास में थे। पाकिस्तान का जन्मदाता दम तोड़ रहा था और लियाकत अली अपने कुछ चुनिंदा सहयोगियों के साथ जाम छलका रहे थे। जिन्ना की मौत के बाद लियाकत अली ने कहा था कि ‘मुझे मालूम ही नहीं था कि जिन्ना कराची में हैं और इस हालत में हैं।’

इस तरह अपनी जीद और सत्ता के शिखर पर पहुंचने की सनक की वजह से एक अलग मुल्क की तामीर करने वाले जिन्ना ने बेहतर जिंदगी की तलाश में ताउम्र गुजार दी और आखिरी में उनको सुकूनभरी मौत भी नसीब नहीं हुई।

जमुनादास अख्तर द्वारा लिखित पुस्तक 'क्या पाकिस्तान जिंदा रहेगा ?' से साभार

यह आर्टिकल नईदुनिया.कॉम के आर्काईव से लिया गया है।

Posted By: Yogendra Sharma