समन्वय पाण्डेय, कुंभनगर। वसंत पंचमी के साथ कुंभ के प्रमुख स्नान पूरे हो चुके हैं। अब संतों के ठिया उठने लगे हैं। इससे पहले रवानगी की अंतिम क्रिया अमृत धर्म ध्वज को उतारने की भी होती है। इस समय हर संत और अखाड़े में मौजूद लोग धर्म ध्वज के अमृत को पाने की चाह में दौड़ पड़ते हैं। छीना-छपटी होती है। मान्यता है कि यह अमृत घर में सुख-समृद्धि लाता है। घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

बुधवार को श्री पंचायती बड़ा उदासीन निर्वाण अखाड़ा में यह क्रिया हुई। संतों में अमृत धर्म ध्वज का अमृत लेने के लिए होड़ मच गई। जो श्रद्धालु अखाड़े में थे, वे भी दौड़े, जबकि ज्यादातर को सीआरपीएफ ने गेट पर रोक दिया था। अखाड़े के महंत अत्योदानंद महाराज ने बताया कि यह परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है। कुंभ शुरू होने के पहले धर्म ध्वज को लगाया जाता है। इसे देव मानते हैं। शिव का रूप मानते हैं।

अखाड़े के चारों प्रमुख महंतों और संतों की उपस्थिति में पंचोपचार पूजन के साथ ध्वज को लगाया जाता है। ध्वज के ऊपर मोरपंखी लगाते हैं, जिससे अखाड़े में नकारात्मक ऊर्जा का असर नहीं पड़ता है। पूरे कुंभ में जो भी साधना, पूजा-अर्चना होती है, उसका सकारात्मक प्रभाव लोगों पर होता है। धर्म ध्वज को उतारने की क्रिया भी विधि-विधान से होती है।

15 से 20 फीट ऊंचे ध्वज को उतारते समय लोगों की सुरक्षा का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। ध्वज जैसे ही नीचे आता है, संत और लोग इसका अंश पाने के लिए टूट पड़ते हैं। महंत बताते हैं कि अमृत को ले जाकर लोग अपने हाथ में बांधते हैं। इससे बुरी नजर से लोगों का बचाव होता है। इसे तिजोरी में भी रखने की परंपरा है।

अखाड़े की साधना को सफल बनाने में सभी संत-महात्माओं के साथ सुरक्षा में लगे सेवकों और सीआरपीएफ के जवानों का काफी योगदान रहा। इसके बाद महंत महेश्वरदास ने अखाड़े के इस कुंभ के अंतिम भंडारे को संबोधित किया और अमृत निशा प्रदान की।

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