#RahatIndori : 1 जनवरी, 1950 में जन्‍मे राहत इंदौरी की स्‍कूली व कॉलेज की शिक्षा भी इंदौर में ही हुई। राहत इंदौरी का असली नाम राहत कुरैशी था। उन्‍हें इंदौर शहर से बहुत लगाव था। वे कहते थे कि मैं पक्‍का इंदौरी हूं। मुझे इस शहर से, इसकी मिट्टी से, लोगों से बेहद प्‍यार है। और इससे भी ज्‍यादा फख्र है कि मैं इंदौरी हूं। मैं ढाई लाख की आबादी में भी खुद को इंदौरी मानता था। 25 लाख से ज्‍यादा की आबादी में भी मानता हूं, और मानता रहूंगा। दुनिया भर में अपनी शायरी के दम पर शहर का नाम रोशन करने वाले राहत इंदौरी ने एक बार बताया था क‍ि उनकी पहचान राहत इंदौरी के तौर पर कैसे शुरू हुई। जानिये उन्‍हीं के शब्‍दों में।

पता नहीं चला कब इंदौरी बन गया

एक समय में इंदौर बड़ा गणपति से शुरू होता था और पलासिया पर खत्‍म हो जाता था। लेकिन आज इसी जगह से एक नया इंदौर शुरू होता है। उन्‍होंने बताया कि आईके कॉलेज में पढ़ने के साथ ही मैं खुद स्‍कूल में पढ़ाता और क्‍लर्क की नौकरी भी करता। हर आदमी में दस बीस आदमी होते हैं। बुनियादी तौर पर एक पेंटर के साथ एक और शख्‍स मुझमें भी था। अंदर ही अंदर एक शायर पल रहा था। वो कब बाहर आया और मैं कब राहत कुरैशी से राहत इंदौरी बन गया पता नहीं चला। हर इंसान में एक बेहतरीन हुनर रखने वाला शख्‍स मौजूद होता है। बस जरूरत है खुद को पहचानने की। जमाने की सुनना बंद करें, हम खुद को पहचान जाएंगे।

डेढ़ साल में मशहूर हो गया

शायरी का शौक दोस्‍तों के बीच शायरी कहकर पुरा होता था। लोगों ने अहसास दिलाया कि मजे व मस्‍ती के लिए की जाने वाली शायरी में कुछ खास बात है। इसके बाद मैंने कोशिश जारी रखी। 1971 में देवास में होने वाले सालाना जलसे में मुझे मंच मिला। इस शुरुआत के बाद महज डेढ़ साल में ही मुझे देश भर में शोहरत मिल गई। मैं खुशनसीब हूं कि मेरा कामयाबी का सफर कभी थमा नहीं।

Posted By: Navodit Saktawat

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