नई दिल्ली ब्‍यूरो। विदेशी शह पर देश के विकास को अवरुद्ध करने की आईबी की रिपोर्ट ने गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को बैकफुट पर ला दिया है। आईबी के निशाने पर आए एनजीएओ ने खुद को विकास के लिए प्रतिबद्ध बताते हुए पूरी रिपोर्ट को मनगढंत और झूठा करार दिया है।

उन्हें इस रिपोर्ट को बनाने और मीडिया में लीक करने का मतलब समझ में नहीं आ रहा है। कभी वे रिपोर्ट को सीधे पीएमओ को सौंपने पर सवाल उठाते हैं, तो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गरीबोन्मुख विकास की घोषणा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश बताते हैं।

सीएनडीपी के अचिन विनायक ने कहा कि हम विकास के खिलाफ नहीं है। हालांकि, वह गृह मंत्रालय के मातहत आने वाले आईबी की रिपोर्ट सीधे पीएमओ को भेजने और मीडिया में लीक किए जाने की वजह नहीं समझ पा रहे हैं।

इसी एनजीओ से जुड़े प्रफुल्ल विदवई ने दावा किया कि रिपोर्ट में शामिल ग्रीन पीस के अलावा किसी एनजीओ ने कोई विदेशी सहायता नहीं ली है। हालांकि, उन्होंने माना कि आंदोलनों के दौरान विभिन्न एनजीओ और सिविल सोसाइटी एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। इसमें विदेशी एनजीओ से सहयोग लेना भी अपवाद नहीं है।

आईबी रिपोर्ट के पीछे किसी बड़ी साजिश की आशंका जताते हुए पूर्व ऊर्जा सचिव व परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के मुखर विरोधी एमसी देवासहायम ने कहा कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर चल रही है। उनका कहना था कि आईबी की रिपोर्ट प्रधानमंत्री की सहभागिता और गरीबोन्मुख विकास की घोषणा के एकदम खिलाफ है।

उन्होंने मोदी से रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए तह तक जाने की अपील की है। त्रिपुरा के पूर्व डीजीपी केएस सुब्रह्माण्यम ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दे पर रिपोर्ट बनाने को आईबी के अधिकार क्षेत्र से बाहर करार दिया।

उनका कहना था कि नई सरकार की विकास योजनाओं की निगरानी करने वाले एनजीओ की आवाज पहले ही बंद करने की कोशिश की गई है। कुडानकुलम परमाणु बिजली परियोजना का विरोध करने वाले पी. उदयकुमार ने रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों का खंडन किया है।

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