करनाल। मोदी सरकार ने ग्रामीणों के जीवन को बेहतर बनाने के अपने प्रयासों के तहत बजट 2018-19 में गोबर-धन योजना की आज घोषणा की थी। केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बजट भाषण में यह घोषणा करते हुए कहा था कि इस योजना के तहत गोबर और खेतों के ठोस अपशिष्ट पदार्थों को कम्पोस्ट, बायो-गैस और बायो-सीएनजी में परिवर्तित किया जाएगा।

तब कुछ लोगों ने इसे हल्के में लिया था। मगर, ग्रामीण इलाके के लोग अब इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। वहीं, कुछ ग्रामीण उद्यमियों ने इसके फायदे को काफी पहले ही समझ लिया था। उन्होंने गोबर से बिजली बनाकर न सिर्फ अपनी ऊर्जा जरूरत को पूरा किया, बल्कि बिजली के लिए सरकार पर निर्भरता और गोबर की समस्या का भी हल किया था।


हरियाणा के करनाल में रहने वाले आदित्य अग्रवाल और उनके भाई अमित अग्रवाल गोबर-धन का लाभ साल 2014 से ही उठा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने किसी भी तरह की सरकारी सहायता भी नहीं हासिल की थी। उनकी कील और रिवेट्स बनाने वाली दो फैक्ट्रियां हैं, जो पूरी तरह गोबर से बनने वाली बिजली से चलती हैं। प्लांट को चलाने के लिए गोबर गोशालाओं से लेकर आते हैं। इस प्लांट से रोजाना दो मेगावॉट बिजली पैदा होती है।

अस्थमा को ट्रिगर कर सकती है धूल और घर में मौजूद कॉकरोच

वहीं, झज्जर के सिलानी गांव में रहने वाले सुखबीर सिंह ने साल 2010 में अपने पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों के मल से बिजली बनाना शुरू किया था। दरअसल, वह बिजली विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों से परेशान हो गए थे। लिहाजा उन्होंने पशुओं के मल से बिजली बनाने का फैसला किया। उनके पिता सूबेदार राम मेहर और भाई रनबीर पर बिजली विभाग ने कई मुकदमे दर्ज कर रखे हैं। सुखबीर के बायो गैस प्लांट्स से चार पोल्ट्री फार्म के लिए पर्याप्त बिजली पैदा हो जाती है।

ये दोनों मामले तो महज बानगी भर हैं कि ग्रामीण उद्यमी कैसे पशुओं के मल से बिजली पैदा कर रहे हैं। मगर, अब केंद्र सरकार की गोबर धन योजना के आने के बाद कई ग्रामीण उद्यमी इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। उत्तराखंड, पंजाब और तमिलनाडु में कई लोग गोबर से वे बायो गैस, बिजली और खाद बना रहे हैं।

मदरसे में पढ़े शाहिद ने पास की UPSC की परीक्षा, कही ऐसी बात

Posted By: