आज पूरा देश सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती मना रहा है। सरदार ने सन्‌ 1947 में स्वतंत्रता के दौरान भारत को एकसूत्र में पिरोने का जो साहसी काम किया, वैसी दूसरी कोई मिसाल दुनिया में नहीं मिलती। मगर ऐसा नहीं कि सरदार ने यह साहस बड़े होकर ही दिखाया। वे बचपन से ही ऐसे साहसी थे। एक बार तो उन्होंने अपने शरीर पर हुए फोड़े को ठीक करने के लिए स्वयं ही गर्म लोहे की सलाख चिपका दी थी। उनका यह साहस देखकर उनकी माताजी और उपचार करने वाले वैद्य, दोनों ही हतप्रभ रह गए थे।

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में किसान झबेरभाई और धर्मपरायण माता लाड़बाई के परिवार में जन्मे सरदार वल्लभ भाई पटेल छुटपन से ही साहसी, संयमी और वीर थे। अन्याय के विरुद्ध विद्रोह उनके जीवन का विशिष्ट गुण था। उनकी वीरता का सबसे पहला किस्सा कुछ यूं है कि बचपन में एक बार उन्हें फोड़ा हो गया। माता-पिता ने उसका खूब इलाज करवाया, लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। इस पर एक वैद्यजी ने सलाह दी कि इस फोड़े को अगर लोहे की गर्म सलाख से दाग दिया जाए, तो इसके विषाणु जलकर मर जाएंगे और गल चुकी त्वचा भी जल जाएगी। इससे फोड़ा ठीक हो जाएगा।

किंतु प्रश्न यह खड़ा हुआ कि छोटे बच्चे कोगर्म सलाख से दागे कौन? पिता-माता की तो हिम्मत ही नहीं हुई, वैद्यजी भी सहम गए। तब बालक वल्लभ भाई ने खुद ही गर्म सलाख अपने हाथ में ली और फोड़े वाली जगह पर दाग दी। इससे फोड़ा फूट गया और कुछ दिनों में ठीक हो गया।

ऐसा ही एक किस्सा और है जब पटेल बैरिस्टर बनने के बाद वकालत कर रहे थे। एक दिन वे न्यायाधीश के सामने किसी मामले में जोरदार पैरवी कर रहे थे। तभी उनके लिए एक टेलीग्राफ मिला, जिसे उन्होंने पढ़कर जेब रख लिया और बहस करते रहे। पैरवी खत्म होने पर ही वे घर के लिए निकले। बाद में पता चला कि टेलीग्राफ में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी। किंतु सरदार ने पहले अपने कार्य-धर्म का पालन किया, फिर अपने जीवन-धर्म का।

Posted By: Arvind Dubey