मल्टीमीडिया डेस्क। हिंदुस्तान की जन्नत कहे जाने वाला कश्मीर वर्तमान में दुनियाभर में सुर्खियों में बना हुआ है। कश्मीर में अलगाव की आग तो काफी पहले लग चुकी थी, लेकिन देश विभाजन के साथ जब मजहबी उन्माद ने यहां पैर फैलाने शुरू किए तो इसको काबू में लाने की हर कोशिश बेअसर होती रही। आइए जानते हैं आखिर कैसे और किस वजह से कश्मीर देश में रहते हुए भी उसका अंदाज मुल्क से अलहदा रहा।

शेख अब्दुल्ला ने शुरू किया था आंदोलन

कश्मीर में आंदोलन की शुरुआत सन 1946 में हुई थी, जब हिंदुस्तान फिरंगियों से आजादी की जद्दोजहद में लगा हुआ था, उस वक्त शेख अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर रियासत को महाराजा हरि सिंह से मुक्त कराने की जंग छेड़े हुए थे। शेख अब्दुल्ला और पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच दोस्ती के रिश्तों की जोर काफी गहरी थी। 1946 में नेशनल कांफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर छोड़ो आंदोलन शुरू किया। महाराज हरी सिंह को शेख अब्दुल्ला की यह हरकत नागवार गुजरी और उन्होंने शेख अब्दुल्ला को बंदी बनाकर तीन साल का कठोर कारावास देकर जेल भेज दिया।

जवाहर लाल नेहरू ने किया था शेख अब्दुल्ला का समर्थन

पंडित नेहरू को भी महाराज की यह कार्रवाई ठीक नहीं लगी और उन्होंने तुरंत शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर के आंदोलन में भाग लेने की घोषणा कर दी। रियासत में किसी तरह की अप्रिय स्थिति पैदा ना हो इसलिए महाराज ने पंडित नेहरू के कश्मीर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। जैसे ही उन्होंने प्रतिबंध को तोड़कर रियासत में प्रवेश किया, उनको महाराज ने कोहाला में बंदी बना लिया और वापस दिल्ली भेज दिया। कहा जाता है कि पंडित नेहरू ने इसको अपना अपमान समझा और उन्होंने शेख अब्दुल्ला को अपना समर्थन जारी रखा।

देश की आजादी के बाद जब देश की सभी रियसतों के विलय की जवाबदारी जब तात्कालीक गृहमंत्री सरदार पटेल पर थी उस वक्त कश्मीर की जिम्मेदारी पंडित नेहरू ने अपने कंधों पर ली। पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला की तल्खी महाराजा हरीसिंह से कम हुई नहीं थी। इसलिए अब शेख अब्दुल्ला का पलड़ा भारी हो गया था। महाराजा कश्मीर में अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जंग लड़ रहे थे, तो शेख अब्दुल्ला आजाद हो गए हिंदुस्तान में कश्मीर के सर्वेसर्वा बनना चाहते थे।

शेख अब्दुल्ला बने थे कश्मीर के प्रधानमंत्री

आखिर लंबे समय तक चला खींचतान के बाद जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और पाकिस्तानी आगे बढ़ते हुए श्रीनगर में दाखिल हो गए तब काफी मान- मनौव्वल के बाद महाराजा हरीसिंह ने विलय के दस्तावेज पर दस्तखत कर दिए। शेख अब्दुल्ला का इसके बाद खास ख्याल रखा गया और सारे नियम कायदों को दरकिनार करते हुए शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया, जबकि बाकी देश में हर प्रांत का प्रमुख मुख्यमंत्री कहलाया।

उस वक्त कश्मीर की परिस्थिति को मद्देनजर रखकर इस रियासत का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने का समय नहीं था। इसलिए संघीय संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया। यही धारा 306-A बाद में धारा 370 बन गई। इस धारा के तहत जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिल गए। साल 1951 में राज्य को संविधान सभा को अलग से बुलाने की अनुमति प्रदान की गई और 26 जनवरी 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया।

योगेंद्र शर्मा