नई दिल्ली। कहते हैं कि विज्ञान और अंधविश्वास एक साथ नहीं चल सकते हैं। दुनियाभर के वैज्ञानिक अंधविश्वासों को विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं और लोगों को इनसे बचने की सलाह देते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि इतने पढ़े-लिखे और तार्किक बातों पर यकीन करने वाले वैज्ञानिक भी कई अंधविश्वासों को मानते हैं। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ ही अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकोमॉस भी कई तरह के अंधविश्वास और टोने-टोटकों पर यकीन करती है।

इसरो 15 जुलाई को चंद्रयान-2 लॉन्च करने वाला है। इस मौके पर जानते हैं अंतरिक्ष एजेंसियों और उनके वैज्ञानिकों के अंधविश्वास और टोटकों के बारे में...

इसरो में होता है ऐसा

भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो वैज्ञानिक हर लॉन्च से पहले तिरुपति बालाजी मंदिर में जाकर रॉकेट पूजा करते हैं। मिशन की सफलता के लिए मंदिर में रॉकेट का छोटा मॉडल चढ़ाते हैं। इसरो के एक पूर्व निदेशक हर रॉकेट लॉन्च के दिन एक नई शर्ट पहनते थे। अब भी ऐसा करने वाले कई वैज्ञानिक हैं। इसरो के सभी मशीनों और यंत्रों पर विभुती और कुमकुम से त्रिपुंड बना होता है, जैसा कि भगवान शिव के माथे पर दिखता है।

मंगलयान प्रोजेक्ट के समय जब भी मंगलयान को एक से दूसरी कक्षा में डाला जाता था, तब मिशन निदेशक एस अरुणनन मिशन कंट्रोल सेंटर से बाहर आ जाते थे। वे ये प्रक्रिया देखना नहीं चाहते। मंगलयान मिशन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसरो गए थे और प्रोटोकॉल के तहत पीएम के इसरो में मौजूद रहने के दौरान किसी को भी मिशन कंट्रोल सेंटर के अंदर-बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। मगर, अरुणनन को उनकी मान्यता की वजह से मिशन कंट्रोल सेंटर से बाहर आने-जाने की विशेष अनुमति दी गई थी।

रूसी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अंधविश्वास

रूसी अंतरिक्ष यात्री यान में सवार होने के पहले, जो बस उन्हें लॉन्चपैड तक ले जाती है, उसके पिछले दाहिने पहिए पर पेशाब करते हैं। महिलाओं को इससे छूट मिली हुई है, लेकिन कुछ महिला अंतरिक्षयात्री पर्दा डालकर यह परंपरा निभाती हैं। इसकी दिलचस्प कहानी है। दरअसल, 12 अप्रैल 1961 को अंतरिक्ष यात्रा से पहले यूरी गैगरीन बेचैन थे। उन्हें बहुत तेज पेशाब लगी थी। उन्होंने बीच रास्ते में बस रुकवा कर पिछले दाहिने पहिए पर पेशाब कर दी। उनका मिशन सफल रहा, तब से यह टोटका चल रहा है।

रूसी ऑर्थोडॉक्स प्रिस्ट अंतिरक्ष यात्रा से पहले क्रू के सदस्यों को आशीर्वाद देता है और उन पर पवित्र जल छिड़कता है। 24 अक्टूबर 1960 को हुए एक हादसे के बाद से 24 अक्टूबर को कोई लॉन्चिंग नहीं की जाती है। एक छोटा ताबीज या एक खिलौना सोयूज कैप्सूल पर बांधा जाता है और ऑर्बिट में पहुंचने पर उड़ने लगता है। कॉस्मोनॉट अच्छे भाग्य के लिए घुड़सवारी वाले जूते पहनकर बसों से लॉन्चपैड तक की यात्रा करते हैं।

अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सोवियत दौर का गाना 'द ग्रास नियर माई होम' (The Grass Near My Home) बजाया जाता है। इसकी शुरुआत भी यूरी गैगरीन ने की थी। रॉकेट में बैठने के बाद उन्होंने मिशन कंट्रोल सेंटर से कोई संगीत बजाने को कहा। कंट्रोल सेंटर ने उनके लिए रोमांटिक गाने बजाए। तब से लेकर आज तक सभी अंतरिक्ष यात्रियों के लिए वही गाने बजते हैं, जो गैगरीन के लिए बजे थे।

लॉन्च के पहले की रात को 1969 की कल्ट मूवी White Sun of the Desert देखना हर अंतरिक्षयात्री के लिए जरूरी होता है। यूरी गैगरीन यात्रा से पहले अपने ऑफिस में रखे गेस्ट बुक में हस्ताक्षर करके अंतरिक्ष में गए थे। तब से इसे लकी चार्म मानते हुए सभी अंतरिक्ष यात्री गैगरीन के गेस्ट बुक में सिग्नेचर करके यात्रा पर निकलते हैं। इसके साथ ही उन्हें लॉन्च वाले दिन बाल कटवाने के लिए कहा जाता है।

अमेरिकी एजेंसी NASA में 1960 से चल रही है मूंगफली खाने की प्रथा

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA जब भी कोई मिशन लॉन्च करती है तब जेट प्रोप्लशन लेबोरेटरी में बैठे वैज्ञानिक मूंगफली खाते हैं। कहा जाता है कि 1960 के दशक में रेंजर मिशन 6 बार फेल हुआ। सातवें मिशन सफल हुआ, तो कहा गया कि लैब में कोई वैज्ञानिक मूंगफली खा रहा था, इसलिए सफलता मिली। तब से मूंगफली खाने की प्रथा चली आ रही है।

लॉन्च से पहले नाश्ते में सिर्फ अंडा भुर्जी और मांस मिलता है। ये परंपरा पहले अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री एलन शेफर्ड और जॉन ग्लेन के समय से चली आ रही है। 17 अप्रैल 1970 में अपोलो 13 मिशन के फेल होने के बाद नासा के अधिकारी बुरी तरह से डर गए थे। एडमिनिस्ट्रेटर जेम्स बेग्स इस घटना के बाद इतना डर गए थे कि इसके बाद किसी भी मिशन को 13 नबंर नहीं दिया गया।

एक लॉन्च से पहले कमांडर को टेक क्रू के साथ ताश के पत्ते तब तक खेलने होते हैं, जब तक वह हार नहीं जाता है। यह परंपरा कैसे शुरू हुई, यह तो नहीं पता है। मगर, माना जाता है कि दो-व्यक्ति के जैमिनी मिशनों के दौरान यह शुरू हुई होगी। सूट-अप रूम में जहां अंतरिक्ष यात्रियों को नाइट्रोजन के अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए एक घंटे इंतजार करना पड़ता है, वहां वैसा ही कुर्सियां होती हैं जैसी अपोलो युग के दौरान इस्तेमाल की गई थीं।

1965 में जैमिनी VI मिशन के समय से अंतरिक्ष यात्रियों को जगाने के लिए मिशन कंट्रोल के द्वारा चुने गए संगीत को बजाया जाता है, जैसे कि डीन मार्टिन के लिए "गोइंग बैक टू ह्यूस्टन" को बजाया जाता था।